आजाद भारत में आज यह सवाल सबसे अहम होकर रह गया कि देश के नेता आखिर कब तक धर्म और सांप्रदायिक मुद्दों पर अपनी राजनीति चमकाते रहेंगे। अभी हाल ही में उड़ीसा के विश्व प्रसिद्ध तिरुपति बालाजी मंदिर के प्रसाद में जानवरों की चर्बी मिलाने का जो मामला सामने आया है वह वास्तव में धार्मिक भावनाओं को झकझोरने वाला है। खास बात यह है कि तिरुपति के बाद मथुरा और वृंदावन के मंदिरों में भी प्रसाद में इसी तरह अशुद्धीकरण की खबरें आ रही है। इन आरोपों के बारे में भले ही पुस्ट रूप से कुछ भी कहा जाना संभव न सही लेकिन यह तथाकथित खबरें सच है तब भी और झूठ है तब भी इनके दुष्परिणामों को कम नहीं किया जा सकता है। इन खबरों के सामने आने से कुछ नेता और राजनीतिक दल अपने बचाव का रास्ता तलाश रहे हैं तो वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो इन खबरों में अपने राजनीतिक भविष्य की संभावनाएं तलाश कर रहे हैं। उड़ीसा के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू आरोप लगाए जा रहे हैं कि वह अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए इतने नीचे गिर चुके हैं। जन सेवा के संस्थापक पवन कल्याण तो उसे लेकर इतनी आग बबूला है कि उन्होंने तिरुपति देवस्थानम को बंद करने की बात कहते हुए राष्ट्रीय स्तर पर सनातन धर्म रक्षण बोर्ड का गठन करने और देशभर के हिंदू धार्मिक स्थलों की जिम्मेदारी उसे सौंपने तक की मांग कर दी गई। यही नहीं सुब्रमण्यम स्वामी और वाई वी सुब्बा रेड्डी ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी देकर इस मामले की कोर्ट की निगरानी में जांच करने की मांग की है। इसमें कोई संदेह की बात नहीं है कि धार्मिक स्थल और आस्था का सवाल सबसे अधिक संवेदनशील मुद्दा है। इस अति संवेदनशील मुद्दे पर देश के नेताओं द्वारा किस स्तर की राजनीति की जा रही है इसे बताने की कोई जरूरत भी नहीं है। इस मुद्दे को खड़ा करके कितनी आसानी से राजनीतिक सफलता को हासिल किया जा सकता है इसके लिए किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है। आस्था से जुड़े मुद्दों पर वोटो का ध्रुवीकरण सबसे आसान काम है आज एक साथ अगर उड़ीसा से लेकर उत्तर प्रदेश तक मंदिरों के प्रसाद में पशुओं की चर्बी मिलाकर अपवित्र करने की बात की जा रही है तो यह बेवजह नहीं मानी जा सकती है इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक षड्यंत्र है या फिर यह सनातन की आस्था पर कोई प्रहार है। इसकी जांच कराकर इसकी हकीकत को जानना जरूरी है। अन्यथा इसके दूरगामी परिणाम गंभीर भी हो सकते हैं। जाति धर्म के नाम पर समाज को टुकड़ों टुकड़ों में बांटने तथा समाज में भय और हिंसा का माहौल तैयार नहीं किया जाना चाहिए। भारत को अनेकता में एकता की अपनी संस्कृति के लिए एक अलग पहचान मिलती है। विभिन्न धर्मो पंथों और जातीय वाले इस देश में सभी नागरिकों को देश का संविधान समानता का अधिकार देता है। सभी धर्म और जाति को अपने रीति-रिवाज धर्म के अनुरूप पूजा पाठ का अधिकार है लेकिन इसके साथ ही सभी धर्म और संप्रदायों को एक दूसरे का सम्मान करने की भी व्यवस्था है। लेकिन अपने निजी स्वार्थों के लिए समय-समय पर नेताओं और राजनीतिक दलों के अलावा कुछ अराजक और राष्ट्रीय विरोधी तत्वों द्वारा सामाजिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने के प्रयास भी किए जाते रहते हैं जो न तो संवैधानिक और न सामाजिक लिहाज से किसी के लिए हितकर होते हैं। हो सकता है कि तात्कालिक रूप से किसी को कुछ नुकसान या फायदा हो जाता हो लेकिन राष्ट्र को तथा समाज को अंतिम रूप से इसका सिर्फ नुकसान ही होता है क्योंकि देश की एकता और अखंडता तथा सांप्रदायिक सौहार्द्ध के वातावरण में ही कोई राष्ट्र व समाज समृद्ध हो सकता है।



