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एक साथ चुनाव न कराने पर सवाल

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निर्वाचन आयोग द्वारा हरियाणा और जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनावों का कार्यक्रम घोषित कर दिया गया। चुनाव कार्यक्रम घोषित करने वाले मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार से जब पूछा गया कि नवम्बर में महाराष्ट्र विधानसभा का कार्यकाल पूरा हो रहा है तो सभी राज्यों में एक साथ चुनाव कराने में क्या दिक्कत थी? तो उन्होंने महाराष्ट्र में बारिश और त्यौहारों का सीजन होने का तर्क दिया गया। जो किसी के भी गले उतरता नहीं दिख रहा है। उम्मीद यही की जा रही थी कि जिन चार राज्यों में इस साल विधानसभा चुनाव होने है वहंा एक साथ चुनाव कराकर काम खत्म कर दिया जायेगा। मगर राजनीतिक दलों की राजनीति और हार—जीत की आशंकाओं के कारण अलग—अलग समय पर चुनाव कराये जाने का फैसला लिया गया है। कुछ लोगों का कहना है कि कहंा एक राष्ट्र एक चुनाव की बात की जाती है जिससे समय और पैसों के दुरूपयोग को रोका जा सके वहीं दूसरी तरफ चार राज्यों में भी एक साथ चुनाव कराने से बचने की कोशिश की जा रही है। यहीं नहीं इस चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के दौरान भले ही समान प्लेइंग फील्ड का दावा किया गया हो लेकिन चुनाव आयोग पर सत्ता पक्ष की मर्जी के अनुकूल चुनाव कार्यक्रम तय करने का आरोप भी लगाया जा रहा है। दरअसल 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद देश की आबोहवा में आया बड़ा बदलाव भी एक साथ चुनाव न कराने का कारण माना जा रहा है। लोकसभा चुनाव के बाद जो उपचुनाव हुए है और भाजपा द्वारा अपने इंटरनल सर्वे कराये गये है उसमें इन चारों राज्यों में भाजपा के लिए कोई अच्छे संकेत नहीं मिले है माना जा रहा है कि हरियाणा जहंा 1 अक्टूबर को जम्मू कश्मीर के अंतिम चरण के मतदान के साथ मतदान होना है वहंा इन कांग्रेस के कुछ शीर्ष नेताओं के बीच खींचतान चल रही है रणनीतिकार मानते है कि अगर भाजपा हरियाणा में इस कांग्रेसी कलह का फायदा उठा सकी और सत्ता तक पहुंच गयी तो इसका प्रभाव महाराष्ट्र और झारखण्ड के चुनाव पर पड़ेगा। भले ही वह कितना भी कम क्यों न हो, भाजपा की रणनीति क्या है यह बात सिर्फ भाजपा के नेता ही जान सकते है किन्तू अगर हरियाणा और जम्मू कश्मीर के चुनाव परिणाम भाजपा के अनूकूल नहीं आये तो इसका नुकसान भाजपा को महाराष्ट्र और झारखण्ड में होगा। ख्ौर चुनाव आयोग को यह अधिकार है कि वह कब कहंा कैसे चुनाव कराये। अभी यूपी, उत्तराखण्ड सहित कई राज्यों की कुछ सीटों के लिए विधानसभा उपचुनाव होने है। अच्छा ही है कि चुनाव आयोग के अधिकारी और सरकारी मशीनरी चुनाव में लगातार लगी रहे। चुनाव अगर लगातार या एक के बाद एक चुनाव न हो तो फिर लोकतंत्र का उत्सव फीका नहीं पड़ जायेगा। इसलिए सभी काम पर लगे रहे यही ज्यादा बेहतर है। रही बात हार जीत की तो जब चुनाव होगा तो कौन जीता कौन हारा इसका पता लग जायेगा।

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