Home उत्तराखंड देहरादून क्या यह हार का डर है?

क्या यह हार का डर है?

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2 दिन बाद 20 मई को लोकसभा चुनाव के पांचवें चरण में 49 सीटों के लिए मतदान होने जा रहा है। कल प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी जनसभा में कहां कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो वह सुप्रीम कोर्ट से अयोध्या के राम मंदिर निर्माण की फैसले को बदलवा देगी, प्रधानमंत्री मोदी जो 10 सालों से सत्ता शीर्ष पर है अगर उनके द्वारा ऐसी कोई बेबुनियाद बात सार्वजनिक मंच से कही जाती है तो लोग इस पर हसेंगे नहीं तो क्या करेंगे। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को बदलवाना इतना ही आसान होता तो फिर वह तो सत्ता में बैठे हैं। अभी सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बांड को असंवैधानिक करने का जो फैसला दिया गया है उस फैसले को उन्हें बदलवा लेना चाहिए। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी अदालत के फैसलों और वर्तमान लोकसभा चुनाव में हार की संभावनाओं से इतने भयभीत हो चुके हैं कि वह हर रोज किसी न किसी मुद्दे पर अंट—शंट कुछ भी कह देते हैं। कभी वह कांग्रेस के घोषणा पत्र को मुस्लिम लीग का घोषणा पत्र तो कभी उसे माओवादी विचारधारा वाला घोषणा पत्र बताते हुए कहते हैं कि कांग्रेस दलितों, पिछड़ों और गरीबों से सब कुछ छीनकर उन्हें दे देना चाहती है जो ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले हैं। कभी वह कहते हैं कि कांग्रेस सत्ता में आई तो उनकी भ्ौंस छीन लेगी तो कभी कहते हैं कि महिलाओं ने अगर घर में मंगलसूत्र भी छुपा कर रखा है तो उसे भी एक्सरे मशीन द्वारा ढूंढ कर छीन लिया जाएगा। दरअसल इन तमाम निरर्थक बातों के जरिए प्रधानमंत्री मोदी जनता को अगर डरा रहे हैं तो इसके पीछे हार का डर नहीं तो और क्या है? देश की जनता की किसी भी समस्या पर वह कुछ भी कहने या बोलने को तैयार क्यों नहीं है? क्यों प्रधानमंत्री ने 10 सालों में एक बार भी देश के मीडिया से बात नहीं की? क्यों संसद में कभी विपक्ष की बात सुनने और उसका जवाब देने की जरूरत नहीं समझी? क्यों जनता को सिर्फ अपने मन की बात कहते रहे किसानों के महीनाेंं—महीनों चले लंबे आंदोलन से लेकर महिला खिलाड़ियों के यौन उत्पीड़न तक मामलों पर क्यों हमेशा खामोशी साधें रहे? क्यों मणिपुर जैसी हृदय विदारक घटनाओं पर एक शब्द भी बोलने का साहस नहीं दिखा सके। अपने औचक राष्ट्रीय संबोधनों के जरिए नोटबंदी जैसे फैसला सुनाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अगर विपक्ष और आम जनता के किसी सवाल और समस्या पर कुछ बोला या किया होता तो शायद यह हालात पैदा ही नहीं होते कि राहुल गांधी जिन्हे कांग्रेस का पप्पू बना दिया गया और राहुल गांधी व प्रियंका जिन्हे बंटी व बबली बना दिया गया वह उन्हें आज इस अंदाज में न ललकार रहे होते कि मैं प्रधानमंत्री से खुली बहस के लिए तैयार हूं लेकिन मैं जानता हूं कि प्रधानमंत्री मुझसे बहस नहीं कर सकते। कल राहुल गांधी ने अपने चुनावी भाषण में कहा कि आप मुझसे जो कहे वह मैं पीएम मोदी के मुंह से बुलवा सकता हूं। यह सत्य भी है पीएम मोदी इन दिनों राहुल की नकल करते हुए खटाखट खटाखट खूब बोल रहे हैं। जिन अडानी व अंबानी पर 5 साल में एक बार भी नहीं बोले अब उनका नाम लेकर टेंपो में भर भर के कांग्रेस को भेजने की बात मोदी कह रहे हैं। मोदी है तो मुमकिन है वाले मोदी इस चुनाव में कांग्रेस की पिच पर ही खेल रहे हैं वह कैसे खेल पा रहे हैं यह देख देख कर लोग उनका खूब मजाक भी बना रहे हैं और उन्हें ट्रोल भी कर रहे हैं। जिस बाजी की जीत की घोषणा 15 अगस्त को लाल किले के प्राचीर से उन्होंने खुद की थी उस जीती हुई बाजी को वह हार भी सकते हैं इसकी उन्होंने सपने में भी उम्मीद नहीं की होगी। अगर कांग्रेस सत्ता में आई तो यह शब्द जब उनके मुंह से हर रोज निकल रहे हैं तो वह यह बताने के लिए काफी है कि वह कितने भयभीत हैं हार का डर उन पर कितना हावी है।

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