एक और आंदोलन का शंखनाद

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मूल निवास और सख्त भू कानून के मुद्दे पर बीते कल होने वाली स्वाभिमान महारैली में जिस तरह एक स्वस्फूर्त जन सैलाब उमड़ा और आम लोगों में जिस तरह का जनाक्रोश देखने को मिला वह राज्य आंदोलन की तरह राज्य में अपने जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा को लेकर एक और बड़े आंदोलन का शंखनाद है। राज्य के कोने—कोने से जिस तरह से इस रैली में जन सैलाब सड़कों पर दिखाई दिया, उसने सरकार के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। इस महारैली की सफलता इस बात का साफ संकेत है कि सूबे की जनता अब उस रवैये को कतई भी बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है जिससे राज्य के संसाधनों और नौकरियों की लूटपाट होती रहे। इस महारैली में शामिल होने वाले सभी लोगों का कहना है कि बस बहुत हो चुका इन बीते 23 सालों में जो कुछ भी हुआ है वह आगे नहीं चलेगा और अगर सत्ता में बैठे लोगो ने मूल निवास तथा सशक्त भू कानून के मुद्दे पर उनकी आवाज नहीं सुनी तो वह इससे भी उग्र आंदोलन पर मजबूर होंगे। इसमें कोई दो राय नहीं है कि राज्य गठन के बाद राज्य के नेताओं ने राज्य गठन के मूल उद्देश्यों को पूरी तरह से भुला दिया। जिसके कारण राज्य में जहां भ्रष्टाचार की अविरल धारा को प्रवाहित होने का मौका मिला वहीं राज्य की जमीनों की जमकर लूटपाट हुई तथा नौकरियों में धांधली के अलावा बाहरी राज्यों के लोगों को घुसने का पूरा मौका मिला। राज्य में जब पहली कांग्रेस की निर्वाचित सरकार एन डी तिवारी के नेतृत्व में बनी थी तो उन्होंने जो भू—नीति लागू की थी उसमें बाहरी व्यक्तियों को 500 वर्ग गज जमीन गृह उपयोग के लिए खरीदने का अधिकार दिया गया था तथा उघोगों के लिए दी जाने वाली जमीन का उपयोग सिर्फ उघोग के लिए ही किया जाना तय किया गया था और ऐसा न होने पर जमीन को राज्य सरकार के अधीन लेने की व्यवस्था की गई थी। यही नहीं उन्होंने राज्य में लगने वाली सभी उघोगों में 70 फीसदी स्थानीय लोगों को रोजगार देने का नियम भी लागू किया था लेकिन भाजपा के शासनकाल में इस कानून का पालन नहीं किया गया और कृषि भूमि की खरीद का रास्ता भी खोल दिया गया तथा भू उपयोग बदलकर इसका प्रयोग अनेक उद्देश्यों के लिए किया जाने लगा जिससे जमीनों की लूटपाट का रास्ता खुल गया। ठीक उसी तरह मूल निवास के अध्याय ने स्थाई निवास की महत्ता को कम कर दिया। राज्य में मूल निवास हासिल करना किसी के लिए इतना आसान काम हो गया कि बाहर से आए 40 लाख लोग राज्य के मूल निवासी बनकर राज्य के लोगों को मिलने वाली सभी सरकारी सेवाओं के अधिकारी बन बैठे। नेता और कुछ ज्यादा होशियार राज्य के लोगों ने इस झोलझाल को अपनी आय का संसाधन बना लिया। 23 साल राज्य की सरकारों को यह पता ही नहीं चला कि खेल क्या हो रहा है और इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे? आज भी नेता और दल ट्टमेरा काम बनता भाड़ में जाए जनता, के फार्मूले पर ही काम कर रहे हैं जिसका उदाहरण सीएम धामी द्वारा मूल निवास प्रमाण पत्र की अनिवार्यता को समाप्त किया गया वह भी उस स्थिति में जब स्थाई निवास प्रमाण पत्र हो। सूबे के लोगों की मांग है कि जो लोग 1950 से पहले के मूल निवासी हैं वही स्थाई निवासी माने जाने जाए और उन्हें ही मूल निवास प्रमाण पत्र मिले। उनकी यह भी मांग है कि राज्य गठन के बाद मूल निवास प्रमाण पत्र लेने और स्थाई निवास बनाने वालों की जांच की जाए। राज्य में फर्जी प्रमाण पत्रों का विषय लंबे समय से चर्चाओं के केंद्र में रहा है। लोगों के मूल निवास ही नहीं, फर्जी श्ौक्षिक दस्तावेजों से राज्य में व्यापक स्तर पर नौकरियां पा ली गई जिनकी आज तक कोई भी सरकार ठीक जांच तक नहीं कर सकी है। लेकिन अब इस सब के खिलाफ राज्य की जनता सड़कों पर उतर आई है। महारैली में उमड़े जन सैलाब ने सूबे के नेताओं की नींद उड़ा दी है। आंदोलनकारियों का साफ कहना है कि उन्हें जांच समितियाें और सुझाव समितियाें के गठन से कोई सरोकार नहीं है क्योंकि यह सब मामले को टालने के हथकंडे है। वह सरकार से कह रहे हैं कि उन्हें सिर्फ मूल निवास व भू कानून पर सरकार क्या कर रही है बस यह बताएं। सीएम धामी प्रदेश हित में फैसला लेने की बात कर रहे हैं लेकिन पानी क्योंकि सर से ऊपर आ चुका है इसलिए अब इससे बात नहीं बन सकती है क्योंकि जनता अब रिजल्ट मांग रही है।

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