आपदा की मार बेहिसाब

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उत्तराखंड में हो रही आफत की बारिश न सिर्फ इंसानों की जान पर भारी पड़ रही है बल्कि इससे राज्य को भारी आर्थिक नुकसान भी हो रहा है। सामाजिक जनजीवन का ताना—बाना तहस—नहस होता जा रहा है और आम आदमी अपने भावी भविष्य की चिंताओं से घिरा हुआ है। शासन और प्रशासन भले ही लोगों की हर संभव मदद की बात कर रहा हों लेकिन धरातल पर प्रभावित लोगों को कितनी मदद पहुंच रही है? यह एक अलग सवाल है। बीते कल चंबा में दिन के उजाले में एक कार पर पहाड़ से मलबा गिरने से 4 लोगों की मौत हो गई। रेस्क्यू टीम इनमें से किसी एक को भी जीवित मलबे से नहीं निकाल सकी। राज्य में हर रोज लोग हादसों का शिकार हो रहे हैं इस मानसूनी आपदा में अब तक सैकड़ों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं तथा हजारों लोग बेघर हो चुके हैं। शासन—प्रशासन इन लोगों को राहत शिविरों तक पहुंचाने और शवों को ढूंढने या फिर मलबे से निकालने के काम में ही लगा हुआ है इन लोगों तक किसी तरह की आर्थिक मदद नहीं पहुंच पा रही है। राज्य के किसानों की फसलों और जमीनों को जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई कर पाना किसी भी सूरत में संभव नहीं दिख रहा है। इस मानसूनी आपदा से राज्य के दर्जनों पुल और पुलिया क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। सड़कों की हालत क्या है? इस बात से कोई भी अनभिज्ञ नहीं है। सैकड़ों गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय से टूट चुका है और वह खुद न तो बाजार तक पहुंच पा रहे हैं और न ही जरूरी सामान उन लोगों तक पहुंच पा रहा है। ऐसी स्थिति में उनका जीवन यापन कितना मुश्किल हो गया है इसे सिर्फ स्वयं वही जा सकते हैं। इस मौसम में बेघर बार हुए लोग अपने भविष्य की चिंताओं से इस कदर घिरे हुए हैं कि उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि वह अब करें तो क्या करें? सत्ता में बैठे लोग अगर यह कह कर कि आपदा पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं होता है अपने उत्तरदायित्व से पल्ला नहीं झाड़ सकते हैं। खास बात यह है कि इस मानसूनी काल में जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई कैसे होगी। जिन सड़कों और पुलों को नुकसान पहुंचा है क्या उन्हें मानसूनी सीजन समाप्त होने के बाद दुरस्त कर लिया जाएगा। पिछले समय का अनुभव यही रहा है कि मानसूनी आपदा में इंफ्रास्ट्रक्चर को हुए नुकसान को सालों साल तक नहीं सुधारा जा सकता। जो पुल तीन—चार साल पहले टूट गए थे वह आज तक नहीं बन सके हैं ऐसी स्थिति में आज जब दर्जनों पुल और राज्य की लगभग सभी सड़के इस आपदा में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई है उन्हें कैसे सुधारा जा सकेगा या उनका पुनर्निर्माण संभव है। राज्य में भू धंसाव और भूस्खलन की जद में आए सैकड़ो गांवों के विस्थापन तक की अनेक समस्याएं ऐसी है जिनके निस्तारण के लिए राज्य सरकार को लाखों करोड़ रुपए की जरूरत है भले ही केंद्र सरकार चाहे जितनी मदद को तैयार हो लेकिन काम करना भी एक बड़ी समस्या है। स्मार्ट सिटी के कामों का अभी तक पूरा न होना इसका एक उदाहरण है फिर बड़े—बड़े पुलों के निर्माण में तो कई कई साल का समय लग जाता है। खैर राज्य में इस मानसूनी सीजन के बाद सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य की सड़कों और पुलों की मरम्मत करना ही होगा।

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