भ्रष्टाचार पर धामी का वार

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भ्रष्टाचार यूं तो एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या है लेकिन उत्तराखंड राज्य के लिए यह अति गंभीर समस्या इसलिए बनी रही है क्योंकि उत्तराखंड के नेताओं ने राज्य गठन के बाद खुद को भ्रष्टाचारी व्यवस्था का हिस्सा बना दिया और उन्होंने भी दोनों हाथों से जमकर लूटपाट की। राज्य के पहले 3 विधानसभा चुनावों में राज्य का भ्रष्टाचार सबसे प्रमुख मुद्दा भी इसलिए बनता रहा। भाजपा और काग्रेस के नेता एक समय में एक दूसरे के कार्यकाल में हुए घपले—घोटालों की सूचियां लेकर घूमते थे और मतदान स्थलों पर भ्रष्टाचार के मामलों की लिस्टे व बड़े—बड़े होर्डिंग लगाए जाते थे। ऐसा नहीं है कि अब राज्य में भ्रष्टाचार समाप्त हो गया है लेकिन अब स्थितियों में थोड़ा फर्क जरूर आया है। यह फर्क है भ्रष्टाचार के खिलाफ होने वाली कार्यवाहियों का। निसंदेह पुष्कर सिंह धामी के सीएम बनने के बाद उन्होंने प्रकाश में आए भर्ती घोटालों, रजिस्ट्री ऑफिस में होने वाली हेराफेरी से लेकर अन्य कई पुराने मामलों पर सख्त एक्शन लेते हुए कई वरिष्ठ अधिकारियों और कर्मचारियों को जेल भिजवाने का काम किया है। अब ऐसा नहीं रहा है कि तुम हमारे मामलों पर चुप रहोगे और हम तुम्हारे मामलों में कुछ नहीं करेंगे और बोलेंगे? धामी के कार्यकाल में अब तक 10 अधिकारी और कर्मचारी ही जेल नहीं पहुंच चुके हैं अपितु कई नेताओं को भी हवालात की हवा खानी पड़ी है। पेपर लीक मामले में खुद उनकी पार्टी के नेताओं के खिलाफ जिस तरह की कार्रवाई की गई वह उनके गंभीर प्रयासों को ही दर्शाती है। पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भले ही सीएम बनने के बाद भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की बात प्रचारित की हो लेकिन एनएच जमीन घोटाले की सीबीआई जांच की मांग पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के एक पत्र ने उनके जीरो टॉलरेंस की हवा निकाल दी थी। वह अपने विधानसभा के पहले सत्र में जो लोकायुक्त प्रस्ताव लाए वह भी अभी तक धूल फांक रहा है। त्रिवेंद्र सिंह रावत जो खुद ढांचा बीच घोटाले के आरोपी रहे हैं उनसे यह भी उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि वह भ्रष्टाचार रोकने के लिए कोई कारगर पहल कर पाते। भ्रष्टाचार के मामलों और उनकी जांच को लेकर जिस तरह का रवैया सरकारों और अधिकारियों का रहा है उसे इस बात से समझा जा सकता है कि 2016—17 के बीज घोटाले की जांच फाइल जिसमें इसकी जांच एसआईटी से कराने की संस्तुति की जानी थी 2020 में अपर सचिव रामविलास यादव की टेबल पर भेजी गई और वह हमेशा—हमेशा के लिए गायब हो गई। खास बात यह है कि इस फाइल के गायब होने की रिपोर्ट दर्ज कराकर अधिकारियों ने अपना पल्ला झाड़ लिया और जांच या कार्यवाही होने की बात भी हमेशा—हमेशा के लिए दफन हो गई। दरअसल इस राज्य की सच्चाई भी यही है कि आज तक कोई जांच न अंतिम मुकाम तक पहुंची है न कोई नेता जेल गया। नेताओं और अधिकारियों के बीच भले ही किसी मामले में तालमेल बैठा हो या न बैठा हो लेकिन इस मामले में वह कदम ताल मिलाने में कभी भी पीछे नहीं रहे। अब सीएम धामी ने उन तमाम अधिकारियों की सूची तलब की है जो भ्रष्टाचार के मामलों में जांच के घेरे में हैं मगर जांच है कि आगे बढ़ ही नहीं रही है। धामी की इस पहल के बाद जांच आगे बढ़ेगी ऐसी उम्मीद की जा सकती है।

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