निर्वस्त्र होती राजनीति

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राजनीतिक हिंसा और कारणों से महिलाओं को निर्वस्त्र करनेए उन्हें पीटने और सामूहिक दुराचार की जो घटनाएं सामने आ रही है वह अत्यंत ही निंदनीय और दुर्भाग्यपूर्ण है। उससे भी ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण है इन मामलों पर चर्चा को लेकर संसद में होने वाला हंगामा और नेताओं का एक दूसरे को कटघरे में खड़े करने की कोशिश किया जाना। जो इन महिलाओं को निर्वस्त्र ही नहीं कर रहा है वर्तमान दौर के नेताओं और राजनीति के निर्वस्त्र होने का प्रमाण है। मणिपुर की घटना को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संसद में महासंग्राम जारी है जिसके कारण संसद का कामकाज ठप है। वही कल दिल्ली में कोलकाता के हावड़ा में पंचायत चुनाव के दौरान एक महिला प्रत्याशी से मारपीट और उसको निर्वस्त्र किए जाने की घटना को लेकर भाजपा सांसद लोकेश चटर्जी ने तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को कटघरे में खड़ा किया गया। सवाल यह नहीं है कि किस राज्य में किसकी सरकार है और इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने वाले किस दल के हैं। सवाल यह है कि इन शर्मनाक घटनाओं को लेकर देश के नेता और राजनीतिक लोग कितने संवेदनशील हैंघ् अगर सत्ता पक्ष में सच सुनने का साहस है तो उसे सदन में इस पर गंभीर चर्चा के लिए तैयार होना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो संसद से बाहर मीडिया के सामने खेद जताकर और घटना को निंदनीय बता कर दोषियों को कठोर सजा दिलाने की बात कर रहे हैं वह सदन में आकर यह सब कहने को और मणिपुर के लोगों को यह आश्वासन देने पर क्यों तैयार नहीं हैं कि भविष्य में उनके तो क्या देश के किसी भी राज्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृति नहीं होने दी जाएगी। यह कोई पहला मर्तबा नहीं है जब सत्ता पक्ष के द्वारा सार्थक चर्चा की मांग से बचने के लिए संसद की कार्यवाही बाधित हो रही हो। वर्तमान भाजपा की केंद्र सरकार पर यह आरोप विपक्ष हमेशा लगाता रहा है कि पीएम सिर्फ अपने मन की बात सुनाते हैं विपक्षी या जनता के मन की बात को कभी भी सुनने को तैयार नहीं होतेघ् स्वस्थ लोकतंत्र और संसदीय परंपरा व मर्यादाओं को बनाए रखने के लिए सरकार को विपक्ष की बातों को सुनना और उसका वाजिब जवाब देना भी जरूरी है। सरकार के इस रवैया का जनता में कोई अच्छा संदेश नहीं जा रहा है। मणिपुर और हावड़ा की घटनाओं को लेकर अगर नेता एक दूसरे पर आरोपख्नप्रत्यारोप लगाकर अपनी जवाबदेही से बचने की कोशिश कर रहे हैं तो वह अपनी ही छीख्नछलेदरी ही कर रहे हैं। जनता देख रही है कि जिन घटनाओं को लेकर दुनिया भर में देश शर्मसार हो रहा है उन घटनाओं पर भी देश के नेताओं द्वारा किस तरह से बेशर्मी दिखाई जा रही है। इन घटनाओं को लेकर देशवासियों के मन में भारी आक्रोश और गुस्सा है उससे भी अधिक गुस्सा और आक्रोश राजनीतिक संवेदनहीनता को लेकर है। अच्छा हो कि सरकार इन अति संवेदनशील मुद्दों पर अपना अहम और तानाशाह पूर्ण रवैया त्याग कर संसद में धैर्य से विपक्ष की बात सुने और उसका समाधान निकाले अन्यथा ऐसी स्थिति में न संसद की कार्यवाही चलना संभव है और न समस्या का समाधान। सरकार जो महिलाओं के सम्मान का ढिंढोरा संसद से बाहर पीटती रही है उसकी गूंज संसद में भी सुनाई पड़नी चाहिए।

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