विपक्षी एकता पर भाजपा का बड़ा वार

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उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस में टूट—फूट और 2016 के स्टिंग ऑपरेशन जैसे मुद्दों को लेकर चर्चाएं हो रही है वह बेवजह नहीं है। केंद्र और प्रदेश की भाजपा सरकारों द्वारा एक सोची—समझी रणनीति के तहत यह काम किया जा रहा है भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता की कमर तोड़ने और राज्य स्तर पर अपनी प्रतिद्वंदी पार्टियों को कमजोर करने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। बात चाहे पूर्व सीएम हरीश रावत के 2016 के स्टिंग की हो जिसके लिए 7 साल बाद सीबीआई को इससे जुड़े लोगों के वॉयस सैंपल लिए जाने की याद आई है या फिर दिल्ली सरकार के मंत्री मनीष सिसोदिया जिन्हें शराब घोटाले में जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया गया है अथवा लालू यादव परिवार के खिलाफ जमीन के बदले नौकरी मामले में चार्जशीट दायर करने की हो। देशभर की इन तमाम घटनाओं की कड़ियों को अगर देखा जाए तो यही समझ आता है कि इसके लिए जो समय चुना गया है वह जानबूझकर चुना गया है। केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का जो मामला विपक्षी दल उठाकर सरकार को घेरते रहे हैं उन्हें अब चुनाव से पूर्व सबक सिखाने की इन कोशिशों का उद्देश्य क्या है इसे आसानी से समझा जा सकता है अभी हाल में महाराष्ट्र में जो घटित हुआ है उसके पीछे भी कुछ ऐसे ही कारण निहित है। एनसीपी के वह तमाम नेता जो कई घोटालों में आरोपी थे वह अब भाजपा के पाले में इसलिए जाकर खड़े हो गए हैं क्योंकि उन्हें अपने जेल जाने का डर सता रहा था। अजीत पवार सहित तमाम एनसीपी नेताओं द्वारा शरद पवार पर यह दबाव बनाया जा रहा था कि वह भाजपा के साथ खड़े हो और जब पवार ने उनकी बात नहीं सुनी तो वह उन्हें छोड़कर एनसीपी से ही अलग हो गए। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि बिहार के मुख्यमंत्री की तरह एनसीपी के पूर्व अध्यक्ष शरद पवार भी राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता को मजबूत करने और सभी को जोड़ने के काम में लगे हुए थे। अब वह सब कुछ छोड़ कर अपनी पार्टी को बचाने की कोशिशों में व्यस्त हैं। ठीक वैसे ही स्थिति में बिहार के मुख्यमंत्री को भी देखा जा सकता है जो अपनी पार्टी में बगावत की आग की आहट मिलते ही अपने विधायकों को एकजुट रखने के प्रयासों में लगे हुए हैं। खास बात यह है कि भाजपा के नेताओं द्वारा भले ही केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाईयों के बारे में यह कहा जाता रहा हो कि कानून अपना काम कर रहा है लेकिन कानून कैसे अपना काम करता है यह सभी जानते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि जो लोग गारंटी देकर जनता को भ्रमित कर रहे हैं उनके लिए मोदी की भी एक गारंटी है कि वह किसी भी भ्रष्टाचारी को जेल भेज कर ही छोड़ेंगे। लेकिन उन्हीं की पार्टी द्वारा महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार के आरोपियों को मंत्री और उपमुख्यमंत्री बनाकर सम्मानित भी किया जाता है। प्रधानमंत्री जो गारंटी दे रहे हैं क्या उसमें विपक्ष और सत्तापक्ष के भ्रष्टाचारियों के इस गारंटी के अलग—अलग मापदंड हैं? विपक्ष आरोप लगाता है कि भाजपा के पास ऐसी वाशिंग मशीन है जो उसके साथ आ जाए उसके सभी दाग धो देती है तो महाराष्ट्र इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। भले ही अभी 2024 का चुनाव दूर सही लेकिन भाजपा ने विपक्ष को कमजोर और नाकाबिल साबित करने के लिए जो रणनीति तैयार की है उसका असर अभी से देखने लगा है। उत्तराखंड में तो कांग्रेस एक दशक से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ ही रही है देखना होगा कि क्या कांग्रेस में अभी और भी टूट—फूट की गुंजाइश बाकी है। अगर ऐसा हुआ तो फिर भाजपा की तो बल्ले—बल्ले है

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