संघर्ष का पर्याय सुशीला बलूनी

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उत्तराखंड राज्य आंदोलन प्रणेयता और भाजपा की वरिष्ठ महिला नेत्री सुशीला बलूनी अब हमारे बीच नहीं रही निसंदेह यह समाचार उत्तराखंड वासियों के लिए अत्यंत ही दुखद और पीड़ादायक है। क्योंकि उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारियों में उनका नाम सबसे अग्रिम पंक्ति की आंदोलनकारियों में गिना जाता है। वह स्वयं इस आंदोलन की हिस्सा ही नहीं रही बल्कि अलग राज्य के लिए लड़ी जाने वाली इस लड़ाई में प्रदेश की महिलाओं को आगे लाने में उनकी अहम भूमिका रही। जिसकी वजह से राज्य के लोग इस आंदोलन को मुकाम तक पहुंचाने में कामयाब हो सके। राज्य आंदोलन में जिस मातृशक्ति की अग्रणीय भूमिका की बात की जाती है उसकी मुख्य आधार स्तंभ सुशीला बलूनी ही थी। एक महिला होने के साथ—साथ वह न सिर्फ अपनी पारिवारिक तमाम जिम्मेदारियों को निभाती रही अपितु राज्य आंदोलन के अलावा अन्य तमाम क्षेत्रों में निरंतर अपनी सक्रियता बनाए रखने में सफल रही जो किसी भी महिला के लिए आसान काम नहीं हो सकता। उत्तरकाशी के बड़कोट में जन्मी सुशीला बलूनी अधिवक्ता होने के साथ—साथ नेता और समाजसेवी के रूप में अपने पूरे जीवन में सक्रिय रही आंदोलन के दौरान अपने आक्रमक तेवरों के कारण उन्हें कई बार पुलिस की लाठियां भी खानी पड़ी और जेल भी गई। देहरादून कलेक्टर पर बेमियादी अनशन पर बैठने वाली वह राज्य की पहली महिला थी। उनका राजनीतिक जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत जनता दल से की और लंबे समय तक उत्तराखंड क्रांति दल से भी जुड़ी रही। 1996 में वह निर्दलीय और 2002 में यूकेडी के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ी लेकिन सफल नहीं हो सकी। 1989 में वह नगर पालिका की सदस्य रही तथा 2003 में देहरादून नगर पालिका की महापौर का भी चुनाव लड़ा। यह अलग बात है कि वह कभी चुनाव नहीं जीत सकी। पूर्व सीएम भुवन चंद्र खंडूरी के नेतृत्व में उन्होंने भाजपा की सदस्यता ली और उत्तराखंड आंदोलनकारी सम्मान परिषद तथा उत्तराखंड राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष भी रही। 84 वर्षीय सुशीला बलूनी का जीवन निरंतर संघर्ष और सक्रियता के दृष्टिकोण से महिलाओं के लिए सदैव प्रेरणा का रूप में देखा जाता रहेगा। उनके इस संघर्ष के साथी रहे सुबह के नेता और कार्यकर्ता आज उनके निधन से दुखी हैं तो वह उनकी बेबाकी और संघर्षशीलता के कारण ही है वह एक सहृदय व्यक्तित्व की धनी थी उन्होंने राज्य के लोगों को खासकर महिलाओं को अपने हक के लिए लड़ने का तरीका सिखाया। भले ही सुशीला बलूनी अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके जीवन से मिलने वाली प्रेरणा प्रदेश वासियों के साथ सदैव रहेगी।।

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