अनियोजित विकास से विनाश

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उत्तराखंड राज्य गठन के बाद देहरादून को अनप्लांडिट कैपिटल इसलिए घोषित कर दिया गया था क्योंकि यहां राजधानी के लिए जरूरी काम चलाओ इंफ्रास्टे्रक्चर मौजूद था। अलग राज्य मिलने की खुशी में लोग इतने मगरूर थे कि वह यह सोचने को भी तैयार नहीं थे की राजधानी चाहे स्थाई हो या अस्थाई, एक हो या दो राजधानी के लिए अपनी अलग जरूरतें होती है जिन्हें हर हाल में पूरा करना ही होता है। बिना विधानसभा भवन के व बिना सचिवालय, राजभवन और सीएम आवास तथा मंत्री—विधायक आवास सब कुछ चाहिए ही। कामचलाऊ व्यवस्था बनाने के लिए जहां भी जो कुछ हो सका कर लिया गया। लेकिन इसके साथ स्थाई और अस्थाई राजधानी के मुद्दे पर राजनीति भी चलती रही जो अभी तक किसी मुकाम तक नहीं पहुंच सकी है। हालात यह है कि राज्य गठन के 20 साल बाद भी सूबे की राजधानी की मिस्ट्री, मिस्ट्री ही बनी हुई है। एक विधानसभा भवन रिस्पना नदी के किनारे बना है जिससे विधानसभा की कार्यवाहियंा अब तक संचालित होती है जबकि दूसरा भराड़ीसैंण के गैरसैंण में विधानसभा भवन बन कर लगभग तैयार हो चुका है। लेकिन इसके अलावा एक तीसरा विधानसभा भवन रायपुर क्षेत्र में बनाया जाना प्रस्तावित है जिसके लिए 60 हेक्टेयर भूमि चिन्हित की जा चुकी है। 2018 में विकास को गति देने के लिए हायर की गई अमेरिकी कंपनी मैकेंजी ग्लोबल द्वारा नए विधानसभा भवन और सचिवालय के लिए डीपीआर तैयार की जा रही है। सूबे के नेताओं की सोच है कि पुराने विधानसभा भवन व सचिवालय की बिल्डिंग राज्य की भव्यता और गरिमा के अनुकूल नहीं है। नए भवनों के बनने और इस्तेमाल में लिए जाने के बाद सरकार इन पुराने भवनों का क्या इस्तेमाल करती है यह सरकार ही बेहतर समझ सकती है। लेकिन राज्य गठन के दो दशक बाद भी अगर उत्तराखंड जैसा छोटा राज्य पहले बनाओ और फिर तोड़ो के काम में जुटा रहेगा तो इससे राज्य के विकास की प्राथमिकताओं को धक्का जरूर लगेगा। अच्छा होता कि सूबे के नेता मिल बैठकर किसी एक स्थान पर राज्य की स्थाई और एक राजधानी पर सहमति बना लेते तो इससे समय और धन के दुरुपयोग दोनों से बचा जा सकता था। देहरादून के मूल बाशिंदे आज देहरादून के पुराने स्वरूप को याद करते हैं तो उनकी आंखें भर आती है। खुली खुली साफ—सुथरी सड़कें और हरे—भरे बाग बगीचे तथा पेड़ जहां न किसी तरह का प्रदूषण था न शोर न अपराध। स्वच्छ दून सुंदर दून और साक्षर दून की वह छवि उनकी आंखों से अभी भी विसरती नहीं विसर रही थी शहर के मध्य से बहती नदिया, नाले, खालों का शीशे की तरह साफ चमकता पानी। अब अगर स्मार्ट सिटी दून की बात की जाए तो यहां उबड़ खाबड़ सड़के जिनके चौड़ीकरण का काम बीते 20 सालों से लगातार जारी है हर सड़क और चौराहे पर लंबे जाम धूल और धुआं के सिवाय कुछ दिखाई नहीं देता है। अब इन बदहाल सड़कों पर यातायात व्यवस्था को (यूएमटीए) सुधारेगी। राजधानी में बने फुटब्रिज फ्लाईओवर अंडरपास इस विकास का मुंह चिढ़ा रहे हैं। सवाल यह है कि यूनिफाइड मेट्रोपॉलिटन ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी या कोई और इस सूरते हाल को कौन सुधार पाता है।

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