- चुनावी रंण में एक अदृश्य जंग सोशल मीडिया पर भी दिखेगी
- मतदाताओं की सोच प्रभावित कर चुनावी रणनीति का केंद्र बनेगा
- सोशल मीडिया अब जनमत निर्माण का बनेगा एक बड़ा साधन
- पार्टियां कंटेंट क्रिएशन और डिजिटल मैनेजमेंट पर कर रही निवेश
देहरादून। सूबे में आगामी विधानसभा चुनाव में जहां एक ओर रैलियां, जनसभाएं और रोड शो दिखेगा। वहीं दूसरी ओर एक अदृश्य जंग सोशल मीडिया पर लड़ी जाएगी। विधानसभा चुनाव में सोशल मीडिया की भूमिका भले ही आंखों से दिखाई न दे, लेकिन इसका प्रभाव बेहद गहरा हो सकता है। यह न केवल मतदाताओं की सोच को प्रभावित कर रहा है, बल्कि चुनावी रणनीति का केंद्र भी बन सकता है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि इस बार की असली जंग सड़कों के साथ-साथ स्क्रीन पर भी लड़ी जाएगी है। इस यु( में पक्ष और विपक्ष की अग्नि परीक्षा होना लाजमी है।
बता दें कि सोशल मीडिया के युग में अदृश्य चुनावी यु( न हो यह हो ही नहीं सकता है। राजनीतिक दल अब सोशल मीडिया को सिर्फ प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि रणनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफार्म पर माइक्रो-टारगेटिंग के जरिए अलग-अलग वर्गों तक अलग संदेश पहुंचाया जाएगा है। युवा, महिलाएं और पहली बार वोट देने वाले मतदाता इस डिजिटल अभियान के मुख्य केंद्र में हैं। छोटे-छोटे मैसेज, वीडियो क्लिप और ग्राफिक्स के जरिए राजनीतिक नैरेटिव तैयार किया जा रहा है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी कहे जाने वाले इस अनौपचारिक नेटवर्क के जरिए सूचनाएं तेजी से फैलती हैंकृचाहे वह सही हों या भ्रामक। यही कारण है कि सोशल मीडिया अब जनमत निर्माण का एक बड़ा साधन बनेगा है।
सोशल मीडिया की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह उन मतदाताओं तक भी पहुंच बना लेता है जो सार्वजनिक रूप से अपनी राय जाहिर नहीं करते। घर-घर तक पहुंचने वाले मोबाइल फोन और सस्ते इंटरनेट ने साइलेंट वोटर को सीधे राजनीतिक संवाद का हिस्सा बनते है। नेताओं की छवि गढ़ने और विरोधियों के खिलाफ माहौल बनाने में सोशल मीडिया अहम भूमिका निभा सकता है। एक वायरल वीडियो या पोस्ट कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुंचकर धारणा बदल सकता है। यही वजह है कि पार्टियां अब कंटेंट क्रिएशन और डिजिटल मैनेजमेंट पर भारी निवेश कर रही हैं।
सोशल मीडिया पर जहां राष्ट्रीय मुद्दे तेजी से ट्रेंड करते हैं, वहीं स्थानीय समस्याओं को भी अब डिजिटल मंच मिल गया है। गांव की सड़क, पानी या रोजगार से जुड़ी समस्याएं भी वायरल होकर बड़े मुद्दे बन सकते हैं, जिससे चुनावी एजेंडा प्रभावित होता है। सत्ता पक्ष जहां अपनी उपलब्धियों को डिजिटल माध्यम से प्रचारित कर रहा है, वहीं विपक्ष इन प्लेटफार्म्स का उपयोग सरकार की कमियों को उजागर करने के लिए कर रहा है। दोनों के बीच यह डिजिटल मुकाबला चुनाव से पूर्व ही तेज हो गया है।
राजनैतिक विशेषज्ञों की माने तो आम मतदाता को आगामी विधानसभा चुनाव में ‘डिजिटल कुरुक्षेत्र’ के बारे में पूरी जानकारी रखनी होगी। हालांकि अभी चुनाव आयोग ने चुनाव की घोषणा तो नहीं की है, लेकिन अभी से सर्तक और जानकारी पूरी रखनी मतदाता की भी जिम्मेदारी है। क्योंकि वर्तमान जो दौर चल रहा है उससे आगामी विधानसभा चुनाव में मतदाता को ही नुकसान गलत पार्टी या नेता चुनकर हो सकता है। चुनाव अभी दूर है और सोशल मीडिया पर अभी से अदृश्य चुनावी वार चलने लगा है। इसलिए अभी से सावधान रहें।




