समय पूर्व सत्रावसान क्यों?

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उत्तराखंड विधानसभा का शीतकालीन सत्र एक सप्ताह तक चलना था जो महज दो ही दिन में सिमट गया। इन दो दिनों में सरकार ने अपने—अपने जरूरी काम निपटाए और सत्र अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। सत्र अवसान से चंद घंटों में एक अध्यादेश सहित 14 विधेयक पारित कराने तथा अनुपूरक बजट पास कराने को सरकार द्वारा अपनी बड़ी सफलता माना जा रहा है। यह ठीक है कि इस शीतकालीन दो दिवसीय सत्र में महिला आरक्षण और धर्मांतरण पर लाए गए महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित कर दिए गए लेकिन महज 13 घंटों तक चली सदन की कार्रवाई के दौरान जनहित के मुद्दों का क्या हुआ? इससे शायद सरकार को कोई सरोकार नहीं है। नेता विपक्ष यशपाल आर्य का कहना है कि सत्तापक्ष की नियत ठीक नहीं है सरकार उन सवालों से भागना चाहती है जो जनहित के सवाल है जिन्हें विपक्ष उठाना चाहता है। उधर संसदीय कार्य मंत्री का कहना है कि सत्र की अवधि 7 दिन रखी गई थी लेकिन कार्य मंत्रणा समिति के तय एजेंडें अनुरूप ही सत्र का समापन किया गया है। विधानसभा अध्यक्ष का तर्क है उन्हें जो काम दिया गया था जब वह दो दिन में समाप्त हो गया तो फिर सत्र को आगे जारी रखकर क्यों जनता के पैसे की बर्बादी की जाए। सत्र के समय पूर्व समापन के इस खेल में सत्तापक्ष ने विपक्ष को विरोध तक का मौका नहीं दिया। भले ही यह पहली बार नहीं हुआ है इससे पूर्व भी अनेक बार समय से पूर्व सत्र का समापन होता रहा है लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि सरकार की इस जल्दबाजी के पीछे वह अनेक सवाल भी है जिनका या तो सरकार के पास जवाब नहीं है या फिर अगर जवाब है भी तो सरकार उन सवालों का सामना करने से बचने का प्रयास कर रही है। विपक्षी दल कांग्रेस द्वारा आधा दर्जन से अधिक ऐसे मुद्दे और सवाल पूछे गए थे जो सरकार को कटघरे में खड़ा करने के लिए काफी थे। कानून व्यवस्था और भ्रष्टाचार एवं अन्य जन समस्याओं पर सरकार को विपक्ष के सवालों का जवाब देना चाहिए था। राज्य में जिस एसएसएसजी भर्ती घोटाले ने तहलका मचा दिया है उस भर्ती घोटाले पर विपक्ष ने जोरदार तरीके से इस मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की। नेता विपक्ष का कहना है कि इस घोटाले में सत्ता में बैठे लोग शामिल हैं इसलिए इस पर लीपापोती की जा रही है। एसआईटी जिन्हें गिरफ्तार कर रही है अदालत जमानत पर छोड़ रही है। जिस अंकिता मर्डर केस से पहाड़ सिहर उठा था उसकी जांच सीबीआई से कराने की मांग को लेकर पीड़ित परिवार हाई कोर्ट के चक्कर काट रहा है। अगर सरकार आरोपियों को बचाना नहीं चाहती तो इसकी सीबीआई से जांच से क्यों बच रही है। राज्य की स्थाई राजधानी और गैरसैंण ग्रीष्मकालीन राजधानी के नाम पर सरकार जो जनता का बेवकूफ बना रही है। विपक्ष ने सदन से लेकर सड़कों तक सरकार की जिस तरह से घेराबंदी की उसे विपक्ष की बड़ी सफलता माना जा सकता है। लेकिन जनता के मुद्दों पर सदन में बहस न होना या उन्हें उठाने का समय न दिया जाना अच्छे संवैधानिक संकेत नहीं है।

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