महिलाओं के क्षैतिज आरक्षण की लड़ाई

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नैनीताल हाई कोर्ट द्वारा महिलाओं को 30 फीसदी आरक्षण पर रोक लगाए जाने पर अब सूबे की महिलाओं द्वारा मुख्यमंत्री से अनुरोध किया जा रहा है कि सरकार महिलाओं के आरक्षण बहाली का रास्ता निकाले। उधर आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है। हम यहां इन आरक्षण से जुड़े दो मुद्दों का उल्लेख इसलिए कर रहे हैं क्योंकि यह आरक्षण का मुद्दा हमेशा विवाद का विषय रहा है। आजादी के बाद आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था को काग्रेस की केंद्र सरकार द्वारा दशकों तक शायद इसलिए दबा कर रखा गया क्योंकि उसे पता था कि इस व्यवस्था के साथ तमाम विवादों के अध्याय खुल जाएंगे। लेकिन जब देश में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ तो तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने इस आरक्षण की फाइल को धूल झाड़ कर पिछड़ों और गरीबों का कल्याण कार्य किया गया। हो सकता है बीपी सिंह की सोच यह रही हो कि इसके जरिए उनका एससी और एसटी वर्ग के मतदाताओं पर एकाधिकार हो जाएगा लेकिन यह बात उनकी कोरी कल्पना ही साबित हुई और वह सत्ता में बने नहीं रह सके। तब से लेकर आज तक आरक्षण का मुद्दा न सिर्फ वोट बैंक की राजनीति का केंद्र रहा है अपितु विवाद की जड़ रहा है। आरक्षण की मूल भावना में जो कमजोर तबके को ऊपर उठाने, सामाजिक भेदभाव को मिटाने और जातीय विभाजन को निर्मूल करने का उद्देश्य निहित था वह पूरी तरह से पीछे छूट चुका है। अभी केंद्र कि मोदी सरकार ने ओबीसी संवर्ग के लिए कुछ खास व्यवस्था की गई। अब सभी जातियां विभिन्न आधारों पर अपने अपने लिए अधिक से अधिक आरक्षण की लड़ाई लड़ रही हैं। आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था जो 50 फीसदी है यह आरक्षण आगे भी नहीं अधिक ऊपर पहुंच चुका है राज्यों की सरकारें अपने—अपने राज्यों में अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग कर कह कर रही हैं किसे कितना आरक्षण देना है। उत्तराखंड की वर्तमान भाजपा सरकार भी अब महिलाओं के क्ष्ौतिज आरक्षण पर अध्यादेश लाने पर विचार कर रही है। सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 30 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए मुख्य सचिव ने विधाई विभाग से रिपोर्ट मांगी है तथा वह सुप्रीम कोर्ट में हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने के लिए एसएलपी दायर करने पर भी विचार कर रहे हैं। राज्य की महिलाओं के सशक्तिकरण और खासकर उत्तराखंड राज्य की महिलाओं के लिए यह बहुत जरूरी इसलिए भी है क्योंकि राज्य निर्माण से लेकर सामाजिक और आर्थिक विभाग में राज्य की महिलाओं का योगदान सराहनीय है। अगर धामी सरकार महिला सशक्तिकरण और राज्य के विकास के मद्देनजर उन्हें क्ष्ौतिज आरक्षण दिलाने की लड़ाई लड़ते हैं तो यह स्वागत योग्य है। लेकिन इसके पीछे अगर सरकार की मंशा और नियत आधी आबादी (मातृशक्ति) के वोट बैंक पर एकाधिकार की है तो उसे कतई भी उचित नहीं ठहराया जा सकता

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