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हिंदू जागेंगे तो दुनिया जागेगी

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हिंदू जागेंगे तो दुनिया जागेगी। कनाडा में मोहन भागवत का यह संदेश केवल एक धार्मिक उद्घोष मानकर आगे बढ़ जाना आसान है, लेकिन इसके भीतर छिपे व्यापक अर्थों पर विचार करना जरूरी है। हिंदू समाज के जागरण की बात जब भारत की वैश्विक भूमिका और सबकी मदद करना भारत का स्वभाव जैसे विचार से जुड़ती है, तो यह विमर्श केवल हिंदू समाज तक सीमित नहीं रहता। यह सवाल सामने आता है कि दुनिया के सामने भारत अपनी पहचान किस रूप में रखेगा। एक सांस्कृतिक शक्ति के रूप में, एक आध्यात्मिक परंपरा के रूप में या फिर केवल एक तेजी से उभरती आर्थिक शक्ति के रूप में? भारत की सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता और समावेशिता रही है। यहां विचारों के मतभेद के बावजूद सह-अस्तित्व की लंबी परंपरा रही है। इसलिए हिंदू जागरण का अर्थ यदि अपनी सांस्कृतिक जड़ों, कर्तव्यबोध, ज्ञान और मानवीय मूल्यों के प्रति जागरूक होना है तो यह सकारात्मक दिशा है। लेकिन यदि जागरण का अर्थ किसी दूसरे समुदाय के प्रति श्रेष्ठता का भाव पैदा करना है तो यह भारत की मूल सभ्यतागत चेतना के विपरीत होगा। हिंदू दर्शन की ताकत उसकी व्यापकता में है। वसुधैव कुटुम्बकम और सर्वे भवन्तु सुखिनः जैसे विचार भारत की उस परंपरा को सामने रखते हैं, जिसमें अपने कल्याण के साथ समूची मानवता के कल्याण की कामना की गई। ऐसे में हिंदू जागरण का सबसे सार्थक अर्थ यही हो सकता है कि समाज अपने भीतर कर्तव्य, अनुशासन, संवेदना और सेवा की भावना को मजबूत करे। आज दुनिया अनेक संकटों से गुजर रही है। युद्ध, आर्थिक असमानता, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, तकनीकी असुरक्षा और सामाजिक ध्रुवीकरण ने मानवता के सामने नए प्रश्न खड़े किए हैं। ऐसे समय में भारत यदि सबकी मदद करने की बात करता है तो उसके पास केवल उपदेश देने की नहीं, बल्कि अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी भी है। भारत ने आपदा के समय पड़ोसी देशों की सहायता से लेकर वैश्विक स्तर पर मानवीय सहयोग तक कई अवसरों पर अपनी क्षमता दिखाई है। यही वह भूमिका है जिसमें भारतीय सभ्यता का सेवा भाव आधुनिक भारत की विदेश नीति और वैश्विक दायित्व से जुड़ सकता है। लेकिन यहां एक सावधानी भी जरूरी है। दुनिया भारत को तभी गंभीरता से सुनेगी जब भारत अपने भीतर भी उन मूल्यों को मजबूत करेगा जिनकी बात वह बाहर करता है। समाज में जातीय भेदभाव, धार्मिक तनाव, हिंसा, असमानता, महिलाओं की सुरक्षा, कमजोर वर्गों की स्थिति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे प्रश्नों पर भारत का व्यवहार ही उसकी वैश्विक विश्वसनीयता तय करेगा। हिंदू जागरण का अर्थ केवल नारों और राजनीतिक भाषणों तक सीमित नहीं होना चाहिए। जागरण तब होगा जब युवा ज्ञान और कौशल को अपना हथियार बनाएंगे, समाज अंधविश्वास की जगह विवेक को महत्व देगा, प्रकृति को पूजने के साथ उसकी रक्षा भी करेगा और धर्म के नाम पर विभाजन के बजाय सेवा और सद्भाव को प्राथमिकता देगा। कनाडा जैसे बहुसांस्कृतिक समाज में इस संदेश का एक और अर्थ निकलता है। विदेशों में बसे भारतीय समुदाय भारत की संस्कृति के प्रतिनिधि भी हैं। उनकी जिम्मेदारी केवल अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखना नहीं, बल्कि उस पहचान के उन मानवीय पक्षों को दुनिया के सामने रखना भी है जो भारत को भारत बनाते हैं। भारत की शक्ति केवल उसकी जनसंख्या, अर्थव्यवस्था, सेना या तकनीक में नहीं है। उसकी असली ताकत उसकी सभ्यतागत स्मृति और विविधताओं को साथ लेकर चलने की क्षमता में है। यदि हिंदू जागरण इस चेतना को जगाता है कि शक्ति का इस्तेमाल संरक्षण के लिए हो, ज्ञान का इस्तेमाल मानव कल्याण के लिए हो और समृद्धि का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे, तो यह जागरण भारत की सीमाओं से बाहर भी प्रभाव डालेगा। लेकिन यदि जागरण को राजनीतिक ध्रुवीकरण का औजार बना दिया गया तो उसका दायरा संकुचित हो जाएगा। दुनिया को ऐसे भारत की जरूरत नहीं जो अपनी श्रेष्ठता साबित करने में लगा रहे। दुनिया को ऐसे भारत की जरूरत है जो अपनी सभ्यता के आत्मविश्वास के साथ मानवता के लिए रास्ता दिखाए। हिंदू जागेंगे तो दुनिया जागेगी, यह वाक्य तभी सार्थक होगा, जब जागरण के साथ जिम्मेदारी भी जागे। भारत का संदेश दुनिया को यही होना चाहिए कि हमारी शक्ति किसी के विरुद्ध नहीं, सबके कल्याण के लिए है। यही भारत की सभ्यता का आत्मविश्वास है और यही उसके वैश्विक भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी भी।

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