देश के कई हिस्सों में एक बार फिर मौसम ने करवट बदली है। कहीं मूसलधार बारिश है, कहीं आंधी-तूफान का खतरा और कहीं बादल फटने जैसी घटनाओं ने जनजीवन को चुनौती दी है। भारत मौसम विज्ञान विभाग की ताजा चेतावनियां बताती हैं कि मानसून अभी पूरी तरह विदा होने के मूड में नहीं है। उत्तराखंड समेत कई क्षेत्रों में भारी बारिश, गरज-चमक और तेज हवाओं की आशंका जताई गई है। मौसम का यह मिजाज अब महज प्राकृतिक घटना मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हर साल बारिश आती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हर साल उसके साथ हमारी मुश्किलें भी बढ़नी जरूरी हैं? बारिश आफत तब बनती है, जब शहरों का ड्रेनेज जवाब दे देता है, नदियों के किनारों पर बस्तियां बस जाती हैं, पहाड़ों को बिना उनकी क्षमता समझे काट दिया जाता है और सड़कों के निर्माण में प्रकृति की चेतावनियों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। आंधी तब संकट बनती है, जब कमजोर पेड़ बिजली की लाइनों पर गिरते हैं, जर्जर ढांचे खतरा बन जाते हैं और प्रशासन के पास आपदा से निपटने की तैयारी कागजों तक सीमित रह जाती है। सबसे बड़ी विडंबना यही है कि मौसम विभाग चेतावनी देता है, लेकिन चेतावनी और कार्रवाई के बीच अक्सर एक लंबी दूरी दिखाई देती है। अब समय आ गया है कि मौसम अलर्ट को केवल मोबाइल पर आने वाली सूचना न समझा जाए। इसे प्रशासनिक कार्रवाई का शुरुआती संकेत बनाया जाए। जिन क्षेत्रों में भारी बारिश की आशंका है, वहां संवेदनशील सड़कों, पुलों, नालों और नदी-नालों की निगरानी बढ़नी चाहिए। स्कूलों, अस्पतालों और सार्वजनिक स्थलों की सुरक्षा व्यवस्था पहले से परखी जानी चाहिए। पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन संभावित इलाकों की निगरानी और मैदानी क्षेत्रों में जलभराव वाले स्थानों की पहचान पहले से होनी चाहिए। उत्तराखंड के लिए तो यह चेतावनी और भी गंभीर है। यहां पहाड़, बारिश और सड़क का रिश्ता बेहद संवेदनशील है। एक तरफ लगातार बारिश से पहाड़ों की ढलान कमजोर होती है, दूसरी तरफ सड़क निर्माण और अनियोजित विकास का दबाव बढ़ रहा है। नतीजा यह कि सामान्य बारिश भी कई बार यातायात और जनजीवन के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है। मौसम विभाग ने देहरादून, बागेश्वर और नैनीताल में कुछ स्थानों पर भारी से बहुत भारी बारिश तथा गरज-चमक के साथ अत्यंत तीव्र बारिश की संभावना जताई है। देश के दूसरे हिस्सों की तस्वीर भी बहुत अलग नहीं है। झारखंड के लिए भी भारी बारिश के साथ आंधी, बिजली और तेज हवाओं की चेतावनी जारी की गई है। ऐसे में सवाल यह नहीं कि बारिश कितनी होगी। असली सवाल यह है कि बारिश से निपटने के लिए हमारी तैयारी कितनी है। जलवायु परिवर्तन के दौर में मौसम के पुराने अनुमान लगातार चुनौती झेल रहे हैं। कम समय में अत्यधिक बारिश, अचानक बाढ़, तेज हवाएं और तापमान में असामान्य बदलाव अब असाधारण घटनाएं नहीं रह गई हैं। इसलिए आपदा प्रबंधन की सोच भी बदलनी होगी। राहत पहुंचाने की व्यवस्था से आगे बढ़कर नुकसान को रोकने की रणनीति बनानी होगी। शहरों में नालों की सफाई बारिश शुरू होने से ठीक पहले नहीं, पूरे साल होनी चाहिए। नदियों और बरसाती नालों के प्राकृतिक रास्तों पर अतिक्रमण रोकना होगा। पहाड़ों में निर्माण के लिए स्थानीय भूगोल और वहन क्षमता को प्राथमिकता देनी होगी। बिजली और दूरसंचार जैसी जरूरी सेवाओं की आपातकालीन बहाली की व्यवस्था मजबूत करनी होगी और सबसे महत्वपूर्णकृमौसम चेतावनी को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना होगा। क्योंकि आपदा में सबसे कमजोर वही व्यक्ति होता है जिसके पास सूचना सबसे देर से पहुंचती है। सरकारें हर बड़ी बारिश के बाद नुकसान का आकलन करती हैं, मुआवजे की घोषणा करती हैं और नई योजनाओं की बात करती हैं। लेकिन अब जरूरत नुकसान गिनने की नहीं, नुकसान घटाने की है। हर साल राहत पैकेज बांटने से बेहतर है कि संवेदनशील क्षेत्रों को पहले ही सुरक्षित कर दिया जाए। प्रकृति को नियंत्रित नहीं किया जा सकता, लेकिन उसके संकेतों को समझकर नुकसान जरूर कम किया जा सकता है। इसलिए इस बार का मौसम अलर्ट केवल घरों से बाहर निकलते समय सावधानी बरतने की सूचना नहीं है। यह शासन-प्रशासन के लिए भी एक चेतावनी है बारिश का पानी कब आफत बनेगा, यह हमेशा हमारे हाथ में नहीं, लेकिन आफत आने से पहले तैयारी करना पूरी तरह हमारे हाथ में है। अब फैसला मौसम को करना है कि वह कितना बरसेगा और फैसला व्यवस्था को करना है कि वह कितनी तैयार है।




