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हिमालय की चेतावनी

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हिमालय फिर चेतावनी दे रहा है। सवाल यह है कि हम सुन रहे हैं या नहीं? नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ को महज एक प्राकृतिक आपदा मानकर आगे बढ़ जाना आसान है। लेकिन हिमालय की घाटियों से उठती इस तबाही को केवल बादल, बारिश या ग्लेशियर टूटने की घटना बताकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। यह घटना उस बड़े खतरे की ओर इशारा कर रही है, जिसके बीच उत्तराखंड, हिमाचल और नेपाल जैसे हिमालयी क्षेत्रों में लगातार सड़कें, सुरंगें, बांध, जलविद्युत परियोजनाएं और दूसरी बड़ी परियोजनाएं खड़ी की जा रही हैं। नेपाल की हालिया त्रासदी में पानी के साथ पहाड़ का मलबा भी नीचे आया और बुनियादी ढांचे को तबाह करता चला गया। रिपोर्टों के मुताबिक सड़कें, पुल और बिजली से जुड़ा बुनियादी ढांचा भी इसकी चपेट में आया। यही वह बिंदु है, जहां उत्तराखंड को अपनी तरफ देखना होगा। क्योंकि हिमालय कोई सामान्य भूभाग नहीं है। यह भूगर्भीय रूप से युवा और अत्यंत संवेदनशील पर्वत श्रृंखला है। यहां चट्टानें कमजोर हैं, ढलान तीखे हैं, नदियों की घाटियां संकरी हैं और भारी बारिश या ग्लेशियर से जुड़ी घटनाएं अचानक बड़ी तबाही में बदल सकती हैं। विशेषज्ञ यह भी मानते रहे हैं कि सड़क कटिंग, सुरंग निर्माण, जलविद्युत परियोजनाएं और मलबे का अनियोजित निस्तारण प्राकृतिक ढलानों की संवेदनशीलता बढ़ा सकते हैं। तो सवाल सीधा है क्या पहाड़ में बने हमारे प्रोजेक्ट बदलते मौसम और बदलते हिमालय के मुताबिक सुरक्षित हैं? सिर्फ परियोजना की डिजाइन देखकर इसका जवाब नहीं मिल सकता। हमें यह देखना होगा कि जिस पहाड़ में परियोजना बनाई गई है, वह अगले 20, 30 या 50 साल में कैसा व्यवहार करेगा, जिस नदी पर बांध बनाया गया है, उसका जल प्रवाह चरम बारिश की स्थिति में कितना बदल सकता है? जिस पहाड़ के भीतर सुरंग बनाई गई है, वहां भूस्खलन या भूगर्भीय हलचल की स्थिति में क्या होगा? और सबसे महत्वपूर्ण अगर एक परियोजना विफल होती है तो उसके नीचे बसे गांवों और दूसरी परियोजनाओं पर उसका असर कितना होगा? यही संचयी जोखिम का सवाल है, जिसे अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं ने पहले ही बता दिया है कि पहाड़ की आपदाएं अब केवल एक स्थान तक सीमित नहीं रहतीं। एक जगह भूस्खलन होता है तो सड़क बंद होती है, सड़क बंद होती है तो राहत प्रभावित होती है, नदी में मलबा जाता है तो दूसरी जगह खतरा पैदा होता है। अगर इसी श्रृंखला में कोई बड़ी परियोजना भी शामिल हो जाए तो नुकसान कई गुना बढ़ सकता है। हिमालय में विकास जरूरी है। बिजली चाहिए, सड़क चाहिए, संचार चाहिए, रोजगार चाहिए और गांवों तक बेहतर सुविधाएं भी पहुंचनी चाहिए। सवाल विकास के खिलाफ खड़े होने का नहीं है। सवाल यह है कि क्या विकास की रफ्तार पहाड़ की वहन क्षमता से ज्यादा तो नहीं हो रही? क्योंकि अगर पहाड़ ही सुरक्षित नहीं रहेगा तो उस पर खड़ा विकास भी सुरक्षित नहीं रह सकता। नेपाल की घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह साझा हिमालय और साझा नदी तंत्र की वास्तविकता सामने लाती है। सीमा के इस पार या उस पार हुई बड़ी प्राकृतिक घटना का असर दूसरे देश और दूसरे क्षेत्र तक पहुंच सकता है। इसलिए हिमालय के लिए आपदा प्रबंधन भी सीमाओं से बाहर सोचने की जरूरत है। अब वक्त केवल आपदा आने के बाद राहत और बचाव की व्यवस्था मजबूत करने का नहीं, बल्कि आपदा से पहले परियोजनाओं की सुरक्षा का आडिट करने का है। हर बड़ी परियोजना की दोबारा समीक्षा होनी चाहिए। भूगर्भीय स्थिरता, अत्यधिक वर्षा, ग्लेशियर से जुड़े खतरे, भूस्खलन, मलबे का दबाव और परियोजना के नीचे रहने वाली आबादी के जोखिम को ध्यान में रखकर। हाल के वर्षों में हिमालयी जलविद्युत परियोजनाओं के आसपास बार-बार सामने आए बाढ़ और भूस्खलन के मामलों ने भी परियोजना नियोजन और आपदा तैयारी पर सवाल उठाए हैं। सबसे जरूरी है रियल टाइम चेतावनी तंत्र। पहाड़ में कई बार आपदा आने और चेतावनी मिलने के बीच समय बहुत कम होता है। ऐसे में मौसम, नदी के जलस्तर, ग्लेशियर झीलों और भूस्खलन की निगरानी को परियोजना सुरक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाना होगा। नेपाल की बाढ़ को देखकर डरने की नहीं, जागने की जरूरत है। क्योंकि हिमालय हमें बार-बार बता रहा है कि वह हमारी फाइलों, नक्शों और परियोजना रिपोर्टों के हिसाब से नहीं चलता। उसकी अपनी भूगर्भीय भाषा है, अपना स्वभाव है और अपनी सीमाएं हैं। विकास पहाड़ पर होना चाहिए, लेकिन पहाड़ की कीमत पर नहीं। नेपाल की त्रासदी को अगर हमने सिर्फ एक और आपदा मान लिया, तो अगली चेतावनी शायद हमारे दरवाजे पर होगी। सवाल सिर्फ यह नहीं कि पहाड़ में बने प्रोजेक्ट कितने बड़े हैं। सवाल यह है कि वह बदलते हिमालय के सामने कितने टिकाऊ हैं।

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