करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास से है जो अपनी मेहनत की कमाई का एक हिस्सा भगवान के चरणों में अर्पित करते हैं। लेकिन यदि उसी चढ़ावे पर किसी की नीयत डोल जाए, तो यह केवल चोरी नहीं होतीकृयह आस्था की हत्या होती है। बदरीनाथ धाम में चढ़ावे की कथित हेराफेरी का मामला जितना सामने आया है, उससे कहीं अधिक सवाल उसके पीछे छिपे दिखाई दे रहे हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि एक कर्मचारी पर कार्रवाई कर दी गई है, तो क्या पूरी व्यवस्था निर्दाेष मानी जाए? क्या इतने संवेदनशील और करोड़ों रुपये के लेन-देन वाले धार्मिक संस्थान में निगरानी व्यवस्था इतनी कमजोर थी कि किसी को भनक तक नहीं लगी? या फिर सब कुछ जानते हुए भी आंखें मूंद ली गई थीं? यही कारण है कि बदरीनाथ के विधायक द्वारा यह कहना कि राम मंदिर से भी बड़ी चोरी का खुलासा हो सकता है महज राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि जांच एजेंसियों के लिए चुनौती है। यदि इस दावे में जरा भी सच्चाई है, तो फिर यह मामला किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की विफलता का दस्तावेज बन सकता है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हाईलेवल जांच समिति बना दी है। यह स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन उत्तराखंड की जनता अब केवल समिति गठन की खबर नहीं पढ़ना चाहती, बल्कि उसकी रिपोर्ट भी देखना चाहती है। प्रदेश ने पहले भी अनेक मामलों में जांच समितियां बनते देखी हैं, जिनकी रिपोर्टें या तो फाइलों में दफन हो गईं या कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिकता निभाई गई। इस बार ऐसा हुआ तो सबसे बड़ा नुकसान सरकार का नहीं, बल्कि देवभूमि की विश्वसनीयता का होगा। बीकेटीसी द्वारा एक पीए का निलंबन पहला कदम हो सकता है, अंतिम नहीं। यदि करोड़ों की आस्था पर चोट हुई है तो जवाबदेही भी शीर्ष स्तर तक तय होनी चाहिए। किसी भी संस्था का प्रमुख केवल सम्मान का अधिकारी नहीं होता, बल्कि जवाबदेही का भी केंद्र होता है। यदि व्यवस्था में सेंध लगी है तो प्रश्न केवल कर्मचारी पर नहीं, पूरी प्रशासनिक श्रृंखला पर उठेंगे। सबसे चिंताजनक बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में मंदिरों के प्रबंधन को लेकर समय-समय पर विवाद सामने आते रहे हैं। कभी व्यवस्थाओं पर सवाल उठे, कभी वित्तीय पारदर्शिता पर और अब चढ़ावे की सुरक्षा पर। यह सिलसिला यदि नहीं रुका तो श्र(ालुओं का विश्वास डगमगाने लगेगा और जब आस्था का भरोसा टूटता है, तब उसकी भरपाई किसी सरकारी विज्ञापन या प्रेस कान्फ्रेंस से नहीं होती। यह मामला किसी दल के पक्ष या विपक्ष का नहीं है। यह उस नैतिक जिम्मेदारी का प्रश्न है, जिसे निभाने की शपथ सरकार और मंदिर प्रबंधन दोनों लेते हैं। यदि दोषी छोटा कर्मचारी है तो उसे सजा मिले, लेकिन यदि दोष ऊपर तक जाता है तो वहां भी कानून का हाथ उतनी ही मजबूती से पहुंचना चाहिए। देवस्थानों में जवाबदेही का पैमाना पद देखकर नहीं, अपराध देखकर तय होना चाहिए। बदरीनाथ के दानपात्र में यदि वास्तव में सेंध लगी है, तो यह केवल ताले की नहीं, व्यवस्था की विफलता है। अब जांच की नहीं, सच सामने लाने की परीक्षा है। सरकार को यह साबित करना होगा कि देवभूमि में भगवान के नाम पर चढ़े एक-एक रुपये की रक्षा केवल घोषणा नहीं, उसकी सर्वाेच्च प्राथमिकता है। यदि इस परीक्षा में चूक हुई तो इतिहास यह नहीं लिखेगा कि चोरी किसने की, बल्कि यह लिखेगा कि आस्था की रक्षा कौन नहीं कर पाया।




