उत्तराखंड की राजनीति में क्या कुछ हो रहा है? और उसका इस राज्य के सामाजिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़ रहा है यह वर्तमान समय में सबसे अधिक चिंतनीय विषय है। आए दिन घटित हो रही घटनाओं पर अगर नजर डालें तो यह राज्य की देवभूमि की संस्कृति के लिए अत्यंत ही खतरनाक स्थिति है। राज्य के गठन के समय से राज्य का स्वरूप कैसा हो? बहस के केंद्र में जरूर रहा है लेकिन सभी सरकारों के कार्यकाल में इसे अपने—अपने नजरिये से गढने के प्रयास किए जाते रहे हैं। किंतु यह राज्य अब अपने अनुरूप विकसित हो रहा है। एनडी तिवारी के कार्यकाल में इस ऊर्जा प्रदेश और डा. निशंक व त्रिवेंद्र रावत के कार्यकाल में धार्मिक पर्यटन प्रदेश बनाने की कवायद के बीच अब तक राज्य सिर्फ पर्यटन प्रदेश की ओर ही बढ़ता रहा है। पर्यटन प्रदेश की इस विकास यात्रा में वह सभी आयाम जो पर्यटन राज्य में स्वाभाविक रूप से निहित हो जाते हैं, हो रहे हैं। दूसरी ओर भाजपा के शासन के बीते एक—एक दशक में राज्य की राजनीति पर धार्मिक उन्माद का रंग भी खूब चढ़ता दिखा है। हर एक घटना को हिंदू मुस्लिम के चश्मे से देखा जाना अब नया नहीं रहा है। बात चाहे थूक जिहाद और लव जिहाद जैसे शब्दों के उत्सर्जन तक सीमित नहीं है राज्य के डेमोग्राफी चेंज की बात को रखकर कालनेमियों और धार्मिक प्रतीकों के खिलाफ चलाए जाने वाले अभियानों से राज्य के समाज में अलगाववाद को पोषित होने का भी भरपूर मौका दिया है। अभी बीते सालों में पहाड़ में तमाम स्थानों व धार्मिक स्थलों और दूसरे समुदाय के लोगों को गांव में न घुसने देने को लेकर तथा उनके व्यवसायों को समेटने को लेकर कई स्थानों पर तनावपूर्ण स्थितियों देखी गई। अभी सहसपुर क्षेत्र में एक मामूली विवाद में एक हिंदू युवक की हत्या मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा किए जाने से लेकर बीते 4 दिन पूर्व ही भारी तनाव की स्थिति देखी गई। बीते कल राजधानी के लख्खी बाग क्षेत्र में एक किशोरी के साथ घटित हुई रेप की घटना को लेकर दोनों समुदाय के लोग आमने—सामने आ गए। पुलिस प्रशासन ने आरोपी नाबालिक को गिरफ्तार कर बाल सुधार गृह भेज दिया गया है लेकिन हिंदू संगठनों का आक्रोश अभी भी चरम पर है। एक नहीं तमाम मामले आए दिन विवाद का कारण बन रहे हैं। कब कौन सा मामला उग्र रूप ले ले इसकी संभावनाएं हर समय बनी रहती हैं। अपराध भले ही अपराध ही होता है वह चाहे किसी भी जाति या धर्म या समुदाय के लोगों द्वारा किया जाए लेकिन जिस तरह का माहौल प्रदेश में बन चुका है वहां अब हर एक अपराध को सांप्रदायिकता के चश्मे से ही देखा जाने लगा है। जो सूबे की कानून व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। राज्य में आने वाले पर्यटकों के साथ छोटी—छोटी मामूली बातों को लेकर मारपीट तथा हिंसा की घटनाएं तो अब आम बात हो चुकी है कर्णप्रयाग में घटित हुई तलवारबाजी तथा बीते कल ऋषिकेश में हरियाणा की कुछ लड़कियों द्वारा जब कार में तेज ध्वनि में गाने बजाने और अर्द्धनग्न अवस्था में घूमने से रोकने का प्रयास किया गया तो उनकी पुलिस के साथ ही भिड़ंत हो गई। जो मारपीट और हाथापाई तक जा पहुंची पुलिस इन्हें लेकर चौकी पहुंच गई। एक नहीं इस तरह की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। पर्यटन की आड़ में नशा और सेक्स का धंधा पनपना भी स्वाभाविक है इसके प्रभाव से देवभूमि की संस्कृति को नहीं बचाया जा सकता है अभी पूर्व सीएम तीरथ सिंह रावत ने इस पर चिंता जताते हुए कहा था कि देवभूमि अब देवभूमि नहीं रह गई है। राज्य में बढ़ता अलगाववाद, नशावर्ती व सेक्स अपराधों की चर्चा करते हुए उन्होंने सरकार और जनता दोनों को इस हालात के लिए जिम्मेदार ठहराया था। चुनावी दौर में ऐसी घटनाओं का बढ़ना और उन्हें तूल दिए जाने की संभावनाएं और भी बढ़ जाती हैं लेकिन इसे रोकने के कोई प्रभावी उपाय नहीं किये जा रहे हैं जो चिंतनीय है।




