‘न हिन्दू बनेगा, न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा’ हिन्दुस्तान की कौमी एकता और सामाजिक संस्कृति को परिलक्षित करने वाला गीत हम सबने सुना होगा। इन दिनां भले ही हमारे देश के राजनीतिक परिवेश में हालांकि तना तनी संस्कृति और धर्म का शोर अधिक सुनाई दे रहा है लेकिन यथार्थ की सरजमी पर जिस तरह नफरत तथा हिंसा का माहौल बीते एक दशक में तैयार किया जा चुका है उसमें समाज में डर—भय तथा असुरक्षा का भाव साफ —साफ देखा जा सकता है। सत्ता के रवैये से सामाजिक विभाजन की यह लकीरें जो अपने राजनीतिक स्वार्थो की प्रतिपूर्ति का खींची है उससे भले ही एक समय लोगों ने चुप रहने को अपनी सुरक्षा का उपाय मान लिया है। लेकिन अब देश के जिस तरह इसके विरोध में लोगों ने आवाज उठानी शुरू कर दिया उसे देखकर अभी भले ही सत्ता के साथ टकराव से सामाजिक माहौल खराब होता दिख रहा है। लेकिन यह वास्तव में इस बेकाबू होती समस्या के समाधान की शुरूआत है। देश के तमाम राज्यों से आने वाली ऐसी खबरें इस बात के लिए भी इस देश में आसान काम नहीं है। अन्तर देश के लखनऊ से आई एक तस्वीर जिस में कुछ मुस्लिम नमाज पढ रहे हैं तथा कुछ हिन्दू युवक एक मानव श्रृंखला बनाकर उनकी सुरक्षा के खडे दिखाई दे रहे है। उत्तराखण्ड के कोटद्वार का वह हिन्दू युवक जिसका नाम अब मौहम्मद दीपक के नाम से पूरे देश में चर्चाओं के केन्द्र में है। वीं लोगों को नफरत की वह राजनीति कतई भी बर्दाश्त नहीं है जो बीते एक दशक से की जा रही है। गौरक्षा के नाम पर होने वाली माव लिंचिग नमाज तथा हनुमान चालीसा पढने को लेकर हिंसा और तोडफोड समाज को स्वीकार नहीं है। और न उसे बांटने तो करोगे जैसे डराने वाले नारों कुछ लेना देना है। इ स की आम आवाम शांति पूर्ण और सदभाव पूर्व माहौल चाहते है जिसमें वक काम धंधा कर सके और अपने परिवार की जरूरतों को पूरा कर सके। वर्तमान सरकार ने अपने 12 साल कार्यकाल में आम आदमी को क्या दिया है? और इससे उसका जीवन कितना आसान या मुश्किल हुआ है इस पर अब लोगाां ने गम्भीरता से सोचना शुरू कर दिया है। करो डरो रोजमरा हर साल देने के वायदे पर देश के बेरोजगार अब किसी भ्रम में नहीं है न वह गरीब जिनके खातों में 15—15 लाख डालने की बात कही गयी और अब पांच किलो राशन के लिए लाईनों में खडे हैं। न वह किसान जिनकी आय दो गुना करने का वायदा किया गया था। अब सत्ता के पास न अ कुछ कहने को नहीं बचा है जिस पर जनता भरोसा कर सके। यही कारण है कि नफरत और सामाजिक विभाजनकारी फंडों के अलावा सरकार के पास कुछ नहीं बचा है। जिसे जनता के सामने परोसा जा सके। लेकिन यह फंडा में अब काम आता नहीं दिखा रहा है जो सत्ता की बेचैनी का सबसे बडा सबब बना हुआ है।




