इन दिनों देश की राजनीति में यूं तो दर्जनों अति गंभीर और संवेदनशील मुद्दे जिरह के केंद्र में है जिन्हें लेकर केंद्र सरकार की फजीहत हो रही है लेकिन इस बीच यूजीसी के विवाद जो अभी भी सर्वाेच्च न्यायालय में विचाराधीन है के बाद एनसीईआरटी की कक्षा आठवीं की सोशल साइंस की एक पुस्तक में न्यायपालिका पर लिखे गए लेख में देश की अदालतों में पेंडिंग पड़े 5 करोड़ 540 लाख से अधिक केस और न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार पर सवाल उठाए गए हैं उन्हें लेकर चीफ जस्टिस की सरकार और एनसीईआरटी पर सख्त टिप्पणी आई उससे सरकार में हड़कंप मचा हुआ है। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार और सिस्टम में व्याप्त बेईमानी के मुद्दे को इस विवाद ने एक बार फिर इसे आम चर्चा के केंद्र में ला दिया है। क्या सरकार ने देश की न्यायपालिका की प्रतिष्ठा पर जानबूझकर यह हमला बोला है बच्चों को न्यायपालिका का भ्रष्टाचार और कार्य प्रणाली को दोष पूर्ण बता कर क्या सरकार उस न्यायपालिका की छवि को खराब करना चाहती है जिस पर देश का आम आदमी सबसे अधिक भरोसा करता है? तीसरा सवाल यह है कि क्या विधायका और ब्यूरोक्रेसी भ्रष्टाचार और बेईमानी से परे हैं फिर बच्चों को सिर्फ न्यायपालिका ही क्यों कार्यपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार और बेईमानी से भी अवगत क्यों नहीं कराया जाना चाहिए? जहां सबसे अधिक भ्रष्टाचार और बेईमानी तथा झूठ तथा फरेब का धंधा दशकों से चला रहा है अगर विश्व की भ्रष्टाचारी देश की सूची पर नजर डालें तो स्थिति अत्यंत ही शर्मनाक है। भ्रष्टाचार देश की कितनी बड़ी समस्या है कि भ्रष्टाचार की दीमक ने देश के आम अवाम का जीना मुश्किल कर दिया है अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान दिल्ली के रामलीला मैदान में उमड़ी भीड़ यह बताने के लिए क्या काफी नहीं थी कि लोग इससे कितने परेशान हैं? बात सिर्फ किसी एक क्षेत्र विशेष की नहीं है न्यायपालिका से भी अधिक भ्रष्टाचार तो कार्यपालिका में व्याप्त है। देश के नेता चुनाव कैसे लड़ते हैं उनके पास पैसा कहां से आता है अभी कोरोना काल में पीएमओ के पते पर सरकार द्वारा जो केयर फंड बनाया गया था क्या सरकार से उसे केयर फंड का हिसाब मांगा जा सकता है जिस पर खुद सरकार द्वारा अब इस बात की व्यवस्था दी जा चुकी है कि संसद में इस पर कोई सवाल नहीं पूछ सकता है। इलेक्टोरल बांड जो वर्तमान सरकार द्वारा लाया गया था भले ही उसे देश की सर्वाेच्च अदालत द्वारा असंवैधानिक बताकर रद्द कर दिया गया हो लेकिन क्या इससे भी बड़ा आर्थिक घपला और कोई हो सकता है मगर इन सबके बारे में एनसीईआरटी किताबों में बच्चों की पढ़ने की व्यवस्था नहीं की जा सकती है। वर्तमान सरकार के गठन के समय भले ही पीएम मोदी ने यह कहा कि ना खाऊंगा ना खाने दूंगा लेकिन बीते दशक में भ्रष्टाचार की जो प्रकाष्ठा हुई है उसका सच कभी ना कभी इस देश की जनता के सामने आएगा तो जरूर। भ्रष्टाचार ही वह मुद्दा है जिसने देश में गरीबों को और अधिक गरीब तथा अमीरों को और अधिक अमीर बनाने में अहम भूमिका निभाई है। अच्छा होता कि न्यायपालिका ही इसका कोई समाधान निकालती क्योंकि अन्य किसी से तो यह अपेक्षा की ही नहीं जा सकती।




