मुश्किलों में फंसी भाजपा

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अंकिता भंडारी हत्याकांड के मामले को लेकर प्रदेश के लोग आग बबूला हैं। वह किसी भी कीमत पर इस हत्याकांड की जांच सीबीआई से कराने की मांग को माने जाने से पहले अपना आंदोलन समाप्त करने को तैयार नहीं है। महिलाओं की अस्मिता से जुड़े इस मुद्दे की अहमियत सिर्फ महिलाओं के उत्पीड़न से जुड़ी समस्या नही है। बल्कि यह एक अत्यंत ही प्रभावी राजनीतिक मुद्दा भी है। इस सत्य को वह आम जनता जो इस आंदोलन को कर रहे हैं वह तो जानते हैं ही इसके साथ ही विपक्षी दल कांग्रेस और भाजपा के नेता भी इसे बखूबी जानते समझते हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जिनके कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल अब जनता को यह समझा रहे हैं कि उन्हें इस मुद्दे की किसी भी जांच से भी कोई गुरेज नहीं है अगर किसी के पास वीआईपी को लेकर पुख्ता सबूत हो तो सही। वह यह सबूत न्यायालय या एसआईटी को सौंप दें उनकी पूरी सुरक्षा की जायेगी। सोचनीय सवाल यह है कि सत्ता में बैठे लोग और उनकी एसआईटी अंकिता हत्याकांड होने के बाद से ही यह क्यों मानने को तैयार नही है कि इस मामले में कोई वीआईपी नही है और आखिर क्यों अंकिता जिस कमरे में रहती थी उसको तोड़ा गया? इस सवाल का जवाब देने को कोई तैयार नही है। दरअसल भाजपा नेताओं ने अपने कार्य व्यवहार से खुद ही इस मामले में सरकार की भूमिका को संदेहास्पद बनाने का काम किया है। शुरुआत में ही अगर उन्होंने अंकिता हत्याकांड की जांच सीबीआई से कराने की ठान ली होती तो आज उन्हे यह दिन नहीं देखने होते। कांग्रेस जो अब इस आंदोलन में पूरी तरह कूद चुकी है उसे यह आंदोलन करने का मौका नहीं मिलता। पूर्व सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत ऐसे अकेले नेता नहीं है, जो अंकिता हत्याकांड की निष्पक्ष जांच की मांग की बात कह रहे है, ऐसे कई नेताओं के इस्तीफे भी भाजपा तक पहुंच चुके है जो इसकी निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे है। कुल मिलाकर मुख्यमंत्री धामी सहित समूची भाजपा इस चौतरफा बढ़ते दबाव के कारण असहज हो चुकी हैं और उनकी खुद की समझ में भी नहीं आ रहा है कि इसका वह पटाक्षेप कैसे करा सकते हैं? समय जैसे—जैसे बीत रहा है स्थितियां और अधिक गंभीर होती जा रही है तथा राजनीतिक माहौल भी गरमाता जा रहा है। मुख्यमंत्री धामी के सामने अपने शासनकाल में पहली बार इस तरह की गंभीर चुनौती पेश आई है वह यह भी जानते हैं कि अगर उन्होेने प्रदेश की जनता की बात नही मानी अथवा जनता नाराज हो गयी तो फिर इसकी भरपाई करना खुद मंुख्यमंत्री तो क्या भाजपा के लिए भी मुश्किल हो जायेगा।

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