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राजनीतिक निर्लजता

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भले ही अंकिता भंडारी हत्याकांड को 3 साल का समय बीत चुका हो लेकिन आज तक इसकी अनुगूंज अगर देवभूमि के कोने—कोने में सुनाई दे रही है तो इसके पीछे राजनीतिक अपराध की गंभीरता और वह निर्लजता ही है कि यह अपराध अति गंभीर अपराधों की श्रेणी में आने वाला अपराध तो है ही साथ ही सत्ता द्वारा इसे छिपाने और दबाने का प्रयास किया जाना भी अति चिंतनीय विषय है। अभी इस मामले में जो कुछ भी नए तथ्य कुछ ऑडियो और वीडियो के माध्यमों से चर्चाओं के केंद्र में आए हैं वह इस बात का साफ संकेत है कि भले ही न्यायालय द्वारा इस हत्याकांड के तीन आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा चुकी हो लेकिन हत्या के खुलासे वाले दिन से इस हत्या के मोटिव से जुड़ा वह सवाल जिसमें किसी वीआईपी को स्पेशल सर्विस देने के लिए अंकिता पर दबाव बनाने की बात कही जा रही थी जिसका जिक्र इस केस की न्यायिक केस फाइल में भी कई जगह आया है वह वीआईपी कौन था? इसका खुलासा क्यों नहीं हो सका? आज भी सवाल ही बना हुआ है। इस मामले में दो बातें काबिले गौर है पहली बात है उस वीआईपी का संबंध सत्ता पक्ष से होना और दूसरी बात है सत्ता पक्ष द्वारा उसे संरक्षण दिया जाना। अगर आरोपी वीआईपी विपक्ष का होता तो भाजपा सरकार उसे बचाने का प्रयास कदाचित भी नहीं करती और उसका जेल जाना तय था। अब तक इस मामले में किसी भी विपक्षी दल के नेता का नाम कभी नहीं चर्चाओं में आया है। भाजपा के नेताओं को इस बात पर गौर करने की जरूरत है कि कांग्रेस के नेता अभी भी किसी बीजेपी के नेता का नाम नहीं ले रहे हैं भाजपा के नेता ही उन नामों का खुलासा कर रहे हैं। भाजपा के जो नेता अब कांग्रेस पर राज्य की एक मरहूम और पीड़िता बेटी की इज्जत पर राजनीति करने और उसे वीआईपी को एसटी समुदाय का बताकर कांग्रेस पर यह आरोप लगा रहे हैं कि कांग्रेस नेता ऐसा करके अपने राजनीतिक फायदे के लिए महिलाओं व बेटियों तथा एसटी समाज का अपमान कर रहे हैं तो यह निर्लजता की एक राजनीतिक पराकाष्ठा ही है। सही मायने में भाजपा के उन नेताओं को उर्मिला सनावर जिसने इस मामले में नए—नए खुलासे किए हैं उसके आरोपों की जांच कराने का साहस दिखाना चाहिए। उसके खिलाफ कोई पुलिस कार्यवाही और मुकदमे पर मुकदमा दर्ज कराकर यह नेता अपनी और अधिक किरकिरी ही नहीं कर रहे हैं बल्कि इस बात की पुष्टि कर रहे हैं कि सनावर के आरोप बेदम नहीं है। अभी बीते कल सनावर ने एक टीवी चैनल पर खुली चुनौती दी है कि उनके पास इस मामले के पुख्ता सबूत है। तथा पुलिस व न्यायालय में इन्हें रखने के लिए वह तैयार है। बात चाहे अंकिता भंडारी हत्याकांड की हो या फिर यूपी के उसे मामले की जिसमें अदालत द्वारा सजायाप्ता भाजपा नेता कुलदीप सेंगर को जमानत पर छोड़ दिए जाने की। महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कुछ ऐसे सवाल इन घटनाओं के पीछे छिपे हैं जिनका जवाब देश की जनता द्वारा मांगे जा रहे है। खास बात यह है कि पुलिस प्रशासन और न्यायपालिका भी जब ऐसे मामलों में सत्ता के पक्ष में खड़ी होती दिखे तो यह सवाल और भी गंभीर हो जाते हैं। उर्मिला सनावर अगर झूठे आरोप लगा रही है तो उन्हें भी इसकी सजा मिलनी चाहिए लेकिन यह सजा उन्हें उनके आरोपों की जांच किए बिना नहीं होनी चाहिए।

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