मुद्दा विहीन राजनीति

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देश की राजनीति में इन दिनों क्या कुछ हो रहा है? इसकी थोड़ी बहुत गलत या सही जानकारी संसदीय सत्र की कार्यवाही जिसका सीधा प्रसारण होता है तथा सांसदों के वह बयान जो संसद भवन के अहाते में आते—जाते मीडिया को दिए जाते हैं। या फिर भाजपा और कांग्रेस द्वारा अपने प्रवक्ताओं की पत्रकार वार्ताओं के जरिए और सोशल मीडिया के माध्यमों से आम आदमी तक पहुंच रहे है वह हैरान और परेशान करने वाली है। कुछ खबरें देश की अदालतों से भी आ रही है जो चौंकाने वाली है। इन तमाम खबरों से एक बात साफ होती है कि राजनीति का स्तर अपने न्यूनतम तक पहुंच चुका है तथा देश की संसद में उन सार्थक मुद्दों पर चर्चा न होकर फिजूल के मुद्दों पर नेता और राजनीतिक दलों के नेता कुर्ता घसीटन करने में लगे हुए हैं। इन दिनों देश में निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूचियों का गहन पुर्ननिरीक्षण कराया जा रहा है। सत्ता पक्ष के नेता इसे देश से घुसपैठियों के निष्कासन और पहचान के लिहाज से जरूरी मानते हैं निसंदेह विपक्ष को भी इसमें कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन विपक्ष इस प्रक्रिया की कमियों को लेकर सरकार से संसद में चर्चा की मांग की जा रही है जिसके लिए सत्ता पक्ष तैयार नहीं है। जैसा कि हम प्रधानमंत्री के वक्तव्य से सुन चुके हैं कि विपक्ष अपनी चुनावी हार की हताशा के कारण संसद में हंगामा करता है, से साफ है कि सरकार विपक्ष के वाजिब सवालों को भी सुनना नहीं चाहती है। अगर इस एसआईआर की प्रक्रिया के जरिए आम नागरिकों को बड़ी संख्या में हटाया जा रहा है तथा मतदाता सूची से उनके नाम काटे जा रहे हैं तो क्या उनके संवैधानिक मताधिकार पर कुठाराघात नहीं है। जिन बीएलओ द्वारा कार्य के दबाव में आत्महत्याएं की जा रही है या टारगेट पूरा न करने पर उन पर एफआईआर कराई जा रही है या उन्हें नौकरियों से हटाया जा रहा है तो क्या इस मुद्दे पर चर्चा नहीं होनी चाहिए कि सरकार तथा निर्वाचन आयोग द्वारा आखिर इतनी जल्दबाजी क्यों की जा रही है। हर चुनाव में सत्ता पक्ष नेताओं द्वारा घुसपैठियों का मुद्दा तो उठाया जाता है लेकिन बिहार जहां अभी चुनाव से पूर्व एसआईआर के नाम पर एक करोड़ के आसपास लोगों के नाम मतदाता सूची से काटे गए वहां कितने घुसपैठिये मिले इसका जवाब भी देना चाहिए। हैरान करने वाली बात है जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से उन्हें मृत बताकर काट दिए गए वह अदालत में जिंदा खड़े दिखाई देते हैं। दिल्ली से एक गर्भवती महिला को पुलिस घुसपैठिया होने के शक में न सिर्फ बांग्लादेश भेज देती है लेकिन जब उस महिला का पिता उसके भारतीय नागरिक होने का दावा लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जाते है तो अदालत के आदेश पर उसे वापस देश लाने के आदेश दिए जाते हैं। सवाल यह है कि जो बीएलओ गलत नीतियों के कारण जान दे रहे हैं या अपना रोजगार गवा रहे हैं या वह महिला जिसे गलत तरीके से घुसपैठियां बताकर देश से निकाला गया उसके लिए जिम्मेदार कौन है संसद में मुद्दों की बात देखिए कि एक सांसद सड़क पर एक कुत्ते को असुरक्षित देखकर पकड़ कर अपनी कार से संसद भवन तक ले आती है जिसे उनका ड्राइवर अपने साथ वापस भी ले जाता है उस पर सवाल उठाए जाते हैं। भाजपा के प्रवक्ता पत्रकार वार्ता करते हैं। बात सिर्फ इतनी सी थी कि उन्होंने कह दिया कि यह तो बहुत मासूम है न भौंकता है न काटता है असली तो अंदर बैठे हैं, यह मजाक भर था। लेकिन सत्ता पक्ष की भावनाएं इससे इतनी आहत होती हैं। इसके जवाब उक्त संसद द्वारा भौ—भौ करके ही दिया जाता है। ऐसा नहीं है कि संसद में सिर्फ भाजपा के सांसद होते हैं कांग्रेस के भी सांसद सदन में होते हैं। क्या इससे निचले स्तर की कोई और राजनीति हो सकती है। पीएमओ के एक बड़े अधिकारी हिरेन जोशी को भ्रष्टाचार के आरोपों में हटाया जाता है तो इस पर चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए? लेकिन नहीं होगी। निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली पर बात ही नहीं होगी।

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