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पहाड़ प्रेम की राजनीति

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सूबेे के तमाम माननीय विधायकों को पहाड़ से इतना प्रेम है कि वह पहाड़ के हित और कल्याण के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। बस उन्हें मौका मिलना चाहिए। इसकी बानगी हमें रजत जयंती पर आयोजित उस विधानसभा सत्र के दौरान देखने को मिली जब इस विशेष सत्र में इन माननीयों को अपनी भावनाओं और उद्गारो को अभिव्यक्त करने का अवसर मिला। सत्तारूढ़ दल भाजपा के विधायकों के विचार सुनकर तो ऐसा लगा कि उन्हें जैसे इस अवसर की लंबे समय से तलाश थी। पहाड़ प्रेम के प्रदर्शन की रौ में यह नेता इस कदर बह गए कि उन्हें इस बात का भी होश नहीं रहा कि वह जो कुछ कह रहे हैं वह उनकी पार्टी और सरकार के लिए ही मुसीबत का सबब बन सकता है। भले ही राज्य में लंबे समय से पहाड़ बनाम मैदान के मुद्दे पर राजनीति होती रही हो लेकिन इस विशेष सत्र में बसपा विधायक शहजाद के उस बयान जिसमें उन्होंने सिर्फ यह कह दिया था कि पहाड़ प्रेम का राग अलापने वाले यह पहाड़ के नेता चुनाव जीतने के बाद सबसे पहले मैदान में अपने लिए आशियाना बनाने और बसने का काम क्यों करते हैं? बस फिर क्या था तमाम नेता पहाड़ और मैदान के मुद्दे पर इस कदर टूट पड़े कि मूल निवास प्रमाण पत्र से लेकर टिहरी विस्थापित, गंगा का जल तक पहाड़ और मैदान की इस जंग का हिस्सा बन गया। विधायक शहजाद ने सही मायनों में एक ऐसा सच सामने रखा था जिसे माननीय पचा नहीं पाते हैं। यहां उन तमाम विधायकों के नाम नहीं लिखे जा सकते हैं जो मूल रूप से पहाड़ के सीमांत जिलों के रहने वाले हैं तथा चुनाव भी वहीं से जीत कर विधायक बने हैं लेकिन उन्होंने अपने रहने और बच्चों के पढ़ने लिखने का इंतजाम दून, हरिद्वार या फिर नैनीताल में कर रखा है। पहाड़ पर अब इनका आना—जाना सिर्फ सैलानियों की तरह पहाड़ दर्शन के लिए होता है। पहाड़ की धरती से लेकर विधानसभा तक कोई एक भी व्यक्ति पहाड़ के इन नेताओं को बर्दाश्त नहीं है। उनके उद्गारो से यह बात साफ हो चुकी है। यह बात अलग है कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में पहाड़ का मुख्यमंत्री होना उनके लिए गर्व की रही हो और देश के तमाम राज्यों में पहाड़ के लोग नौकरी करते रहते हो लेकिन उत्तराखंड में उन्हें कहीं भी कोई भी कतई बर्दाश्त नहीं है। दरअसल इस पहाड़ और मैदान की आग को भड़काने का काम भी इन विधायकों द्वारा अपने निजी और राजनीतिक लाभ के लिए ही किया जा रहा है। कोई इसके जरिए मंत्री की कुर्सी तक पहुंचाना चाहता है तो कोई 2027 के लिए अपना टिकट पक्का करने के जुगाड़ में है। सही मायने में इन्हें पहाड़ से कुछ भी लेना—देना नहीं है। अगर ऐसा होता तो पहाड़ की राजधानी एक दशक पूर्व गैरसैणं बन गई होती जो कि इन नेताओं की राजनीति के फेर में अब तक अटकी है और अटकी ही रहेगी। राज्य में न खनन माफिया का राज होता न शराब माफिया और न ही भू माफिया और नकल माफिया की पौ बारह होती। राज्य को इन तमाम कल्याणकारी योजनाओं की सौगात देने वाले भी तो पहाड़ के वह नेता ही है जो पहाड़ प्रेम की बात करते नहीं थकते हैं। थूक जिहाद, लव जिहाद, कालनेमि और डेमोग्राफी चेंज जैसे मुद्दे पैदा करके तथा पहाड़ बनाम मैदान के मुद्दों को चुनावी मुद्दा बनाने के जो प्रयास हमारे माननीयों द्वारा किए जा रहे हैं वह चिंतनीय है उनसे राज्य का कोई भला नहीं हो सकता है।

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