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लिव इन रिलेशन, उचित या अनुचित

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हिंदू राष्ट्र, गौ रक्षा और सनातन के नाम पर बीते कुछ सालों से देश में बहुत कुछ ऐसा हो रहा है जो नहीं होना चाहिए था। इन घटनाओं का सबसे दुखद पहलू यह है कि राष्ट्र, धर्म और जाति से जुड़े इन मुद्दों पर कोई बोलना नहीं चाहता या बोलने से इसलिए बचता है क्योंकि सत्ता ने उसके मन में इतना डर बैठा दिया है कि हर किसी को यह लगता है कि किस मुद्दे या बात पर सत्ता के अंधभक्त उसका जीवन तबाह कर डालें। यह लोग रायबरेली में एक दलित युवक को पीट—पीट कर मार डालते हैं और मरने वाला राहुल गांधी का नाम लेकर बचने की गुहार लगाता है तो मारने वाले कहते हैं कि यहां सब बाबा वाले हैं। देश के चीफ जस्टिस पर एक अधिवक्ता जूते फेंकने की कोशिश करता है और नारे लगाता है कि सनातन का यह है अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान, खास बात यह है कि इस अधिवक्ता के खिलाफ न तो कोई अदालत कार्यवाही करती है और न ही कोई पुलिस प्रशासन उसे गिरफ्तार करता है। गोकशी के आरोपो को लेकर की जान वाली माब्लीचिंग की अनेक घटनाएं अब तक सामने आ चुकी है। हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र तथा सनातन के नाम पर जिस तरह का तांडव देश के कोने—कोने में देखा जा रहा है तथा जो सनातन के स्वयंभू ठेकेदार है उन्हें इसके अलावा भी उन अनेक समस्याओं पर गौर करने की जरूरत है जो देश के युवा और भावी पीढ़ी के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है। अभी उत्तर प्रदेश के राज्यपाल आनंदीबेन को मैं साधुवाद देना चाहता हूं जिन्होंने एक विश्वविघालय के दीक्षांत समारोह में बतौर मुख्य अतिथि बोलते हुए कहा कि आज 15—20 साल की लड़कियों को हम 1 साल का बच्चा गोद में लेकर अनाथालयाें में भोजन की लाइनों में खड़े होते देख रहे हैं। उन्होंने कहा कि बेटियों को मेरी सलाह है कि वह लिव इन रिलेशन के चक्कर में फंसकर अपनी जिंदगी बर्बाद न करें। एक अन्य बात उन्होंने युवाओं में बढ़ती नशावर्ती को लेकर कहीं। उनका कहना है कि नशा देश के युवाओं का भविष्य बर्बाद कर रहा है। सवाल यह है कि क्यों इन दो बड़ी बुराइयों का ध्यान सनातन की रक्षकों को नहीं जाता है। किसी भी शहर के गली—मोहल्लों से लेकर स्कूल, कॉलेज और छात्रावासों के आसपास नशा तस्करों ने अपने अड्डे बना रखे हैं और धड़ल्ले से भावी पीढ़ियों को बर्बाद करने का सामान बेचा जा रहा है। काश यह समाज सुधारक कभी इस तरफ भी ध्यान दे पाते। उत्तराखंड राज्य देश का पहला ऐसा राज्य है जिसे यूसीसी के जरिए लिव इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता दे दी है। इसे लेकर देवभूमि की देव संस्कृति का ढोल पीटने वालों का किसी ने एक बार भी विरोध भी किया है जो हैरान करने वाला है? लव जिहाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने वालों को देवभूमि में क्या इस प्रावधान को स्वीकार किया जाना चाहिए था? यह एक विचारणीय सवाल है। यूसीसी समान नागरिक संहिता में क्या लिव इन रिलेशनशिप को शामिल किया जाना चाहिए था। खैर सत्ता का कभी कोई दोष नहीं होता है बाबा तुलसीदास ने भी रामायण में यही लिखा है। ट्टसमरथ का नहीं दोष गुसाई,। समर्थ तो सिर्फ सत्ता के पास ही होता है। जो सत्ता करें सो सही। राज्यपाल आनंदीबेन ने सत्ता का ध्यान इस ओर आकर्षित किया है तो इस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

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