मानसून काल में पहाड़ के जनजीवन को तबाह करने वाली आपदा ने अब राज्य के मैदानी इलाकों को भी अपनी जद में ले लिया है। राजधानी दून और उसके आसपास के क्षेत्र में एक दिन पूर्व हुई इस तबाही की तस्वीरे अब सामने आ चुकी हैं एक ही रात में इस आफत की बरसात में लगभग डेढ़ दर्जन लोगों की जान लील ली अपितु निजी और सरकारी संपत्तियों को भी भारी नुकसान पहुंचाया है। कई पुल ध्वस्त हो गए अनेक सड़के बह गई। लोगों के घर, मकान, दुकान तथा होटल और रेस्टोरेंट तबाह हो गए। अभी इस आपदा से हुए नुकसान का अनुमान लगाया जा रहा है। बादल भले ही सहस्त्रधारा से ऊपर दो स्थानों पर फटा हो लेकिन आसपास के क्षेत्रों में भी अतिवृष्टि से भारी नुकसान हुआ है। देहरादून से मसूरी जाने वाले मार्ग पर हुए भारी भूस्खलन व बारिश से सड़के कई जगह पास आउट और बंद हो चुकी है जिसे खुलने में लंबा समय लग सकता है। दून से सहस्त्रधारा जाने वाली सड़क का एक बड़ा हिस्सा आईटी पार्क के पास पास आउट हो गया है तथा ऋषि नगर पर बना पल भी टूट गया है। बात अगर पौटा साहिब जाने वाली सड़क की करें तो प्रेम नगर से आगे नदी पर बने पुल का एक हिस्सा टूट जाने से इस सड़क पर आवागमन पूरी तरह ठप हो गया है। दिल्ली, हरिद्वार दून हाईवे पर फनवैली के पास सौग नदी पर बना पुल भी टूट गया है जिससे यातायात को डाइवर्ट करना पड़ा है। विकासनगर में नदी के बहाव में बहे लोगों की तलाश जारी है तथा वहीं सहस्त्रधारा क्षेत्र में मलबे में दबे लोगों व नदी में बहे लोगों की खोजबीन में टीमें जुटी हुई है। सहस्त्रधारा में व्यवसायियों की जो दुकान होटल और रेस्टोरेंट थे उन्हें भी भारी नुकसान हुआ है। हर एक मानसून काल में मालदेवता और सहस्त्रधारा क्षेत्र चर्चाओं के केंद्र में रहता है। इस साल यहां अब तक कोई बड़े नुकसान की खबर नहीं आई थी लेकिन जाते—जाते भी मानसून इस क्षेत्र के लोगों को गहरे जख्म दे गया है। मसूरी में 3000 से अधिक पर्यटक फंसे हुए हैं। जिनके दून वापसी का रास्ता बंद हो चुका है। गनीमत इस बात की है कि होटल एसोसिएशन ने दरिया दिली दिखाते हुए इन पर्यटकों की मदद की जा रही है। धराली थराली और बागेश्वर की आपदाओं में जो नुकसान हुआ था उसके लिए केंद्र सरकार द्वारा भी मदद की जा रही है। लेकिन एक बात साफ है कि किसी भी मदद से आपदा प्रभावितों को हुए नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती है। इस साल मानसून काल में प्रदेश के लोगों ने आपदा का जो दंश झेला है वह सही मायने में भविष्य के गंभीर खतरों से आगाह करने वाला है। राज्य में अनियोजित तरीके से जो विकास हो रहा है सही मायने में यह विकास नहीं विनाश का सबसे बड़ा कारण है। लेकिन इस सच को कोई मानने को तैयार नहीं है वहीं राज्य में बढ़ता आबादी का दबाव और नदी नालों खालो के प्रवाह क्षेत्रों में किए जाने वाले अतिक्रमण इस विनाश का दूसरा प्रमुख कारण है। हर बार जब भी राज्य में कोई बड़ी आपदा आती है तो इस पर खूब चर्चा की जाती है लेकिन आपदा काल बीतते ही सब कुछ भुला दिया जाता है और सभी लोग इस अंधी विकास की दौड़ का हिस्सा बन जाते हैं कब क्या हुआ? कौन मरा खफा किसका कितना नुकसान हुआ सब कुछ चंद दिनों में ही भुला दिया जाता है। अगर इस समस्या की मूल वजहों पर अभी ध्यान नहीं दिया तो उत्तराखंड ही नहीं हिमाचल और कश्मीर जैसे हिमालयी राज्यों को और भी अधिक बड़ी त्रासदी देखने के लिए तैयार रहना चाहिए।




