भले ही 2025 में देश में सामान्य से कोई बहुत अधिक बारिश न हुई हो लेकिन इस मानसून काल में हुई व्यापक जनधन हानि और जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को देखा जाए तो वह अत्यधिक से भी अधिक है। मौसम विभाग का अनुमान था कि देश में बारिश सामान्य रहने की उम्मीद है, लेकिन अगस्त तक यह सामान्य से सिर्फ 1.2 फीसदी ही अधिक हुई है लेकिन अभी मानसून काल के 15 दिन का समय शेष है। मौसम के मिजाज या जलवायु परिवर्तन के नतीजों पर गौर करें तो यह साफ नजर आता है कि अंतिम चरण में इस बार कुछ ज्यादा ही बारिश हुई है। अगस्त माह बीत चुका है फिर भी पूरे देश में बारिश की तीव्रता कम होने के बजाय और भी अधिक बढ़ती जा रही है। खास बात यह है कि इस अतिवृष्टि का असर हिमालयी राज्यों पर इतना अधिक पड़ रहा है कि जम्मू—कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड जैसे राज्यों में हर तरफ तबाही का मंजर ही दिख रहा है। जनजीवन इस कदर प्रभावित हो रहा है कि हर तरफ त्राहि माम की स्थिति बनी हुई है। लोगों का घरों से निकलना मुश्किल हो गया है। इस समय इन राज्यों में लॉकडाउन जैसे हालात है। स्कूल व कॉलेजों में अवकाश से लेकर बाजारों में पसरे सन्नाटे से इसका अनुमान लगाया जा सकता है। मजदूरों को काम नहीं मिल पा रहा है तथा व्यवसायी अपनी दुकान और प्रतिष्ठानों को खोल नहीं पा रहे हैं और अगर खोल भी पा रहे हैं तो कोई ग्राहक उन तक पहुंच नहीं पा रहा है। पुल और सड़कों के टूटने और बह जाने से पहाड़ पर आवागमन की स्थिति क्या हो गई यह हमारे सामने है। उत्तराखंड की बात करें तो चारधाम यात्रा को पूरी तरह रोक दिया गया है। राज्य के सभी प्रमुख सड़कों सहित लगभग 500 सड़कों पर आवागमन ठप हो चुका है। लोगों तक जरूरी सामान की आपूर्ति भी बमुश्किल हो पा रही है। आपदा ग्रस्त क्षेत्रों तक जब आपदा राहत टीमें और शासन—प्रशासन का पहुंच पाना भी मुश्किल हो रहा है तो सामान्य आदमी की तो बात ही क्या की जा सकती है। किसानों की फंसले चौपट हो चुकी हैं इस सीजन में पहाड़ पर पैदा होने वाली सब्जियां सिर्फ 10 फीसदी ही बची है वह भी मंण्डियों तक नहीं पहुंच पा रही है। ऐसा नहीं है कि इसका असर सिर्फ पहाड़ पर ही पड़ रहा है अतिवृष्टि के कारण मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ जैसे हालात बन चुके हैं। नदियों और नालों ने पहाड़ से लेकर मैदानों तक तबाही मचाई है। इस मानसून काल में सड़कों और पुलों को भारी नुकसान हुआ है। मानसून की विदाई के बाद सरकार और कार्यदायी विभागों के सामने इनकी मरम्मत का काम करना और व्यवस्थाओं को पटरी पर ला पाना बहुत ही चुनौती पूर्ण काम होगा। यह कहना कोई अस्वाभाविक नहीं है कि इस मानसून काल में जीवन पूरी तरह अस्त—व्यस्त हो चुका है। इस तबाही से निजात कब मिलेगी यह सवाल तो अभी भी बना ही हुआ है। साथ ही इस नुकसान की भरपाई कैसे होगी यह सबसे गंभीर सवाल है। जिन लोगों के घर—बार व रोजगार के संसाधन मानसूनी आपदा की भेंट चढ़ गए उनका जीवन सामान्य कैसे हो पाएगा? यह एक अहम सवाल है। आमतौर पर होता यही है कि आपदा काल खत्म होते ही आपदा प्रभावितों के दुःख दर्दों को भुला दिया जाता है। जो एक चिंतनीय विषय है। यह आपदा अब विकराल रूप क्यों धारण करती जा रही है क्या विकास की अंधी दौड़ ही इस विनाश का कारण है इस सवाल पर गहन चिंतन की जरूरत है।




