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बड़े बदलाव की सुगबुगाहट

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किसी भी व्यक्ति, संस्था व सरकार को अस्तित्व में बने रहने के लिए उसकी विश्वसनीयता और उसकी उपयोगिता का बना रहना सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है। अगर विश्वसनीयता व उपयोगिता खत्म तो समझो सब कुछ खत्म। आज अगर केंद्र की सरकार और चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं तथा मीडिया के अस्तित्व पर संकट के बादल घिरे हुए हैं तो उसके पीछे यही दो अहम कारण है। 2014 में जब पहली बार भाजपा केंद्रीय सत्ता में अपने प्रचंड बहुमत के साथ आई थी तब तक देश में सब कुछ सामान्य था लेकिन सत्ता पर काबिज नेताओं द्वारा जब खुद अपने विरोधियों से अधिक बेहतर काम करने के जरिए उनकी लकीर से बड़ी लकीर खींचने की बजाय इस सोच पर काम करना शुरू कर दिया कि दूसरों का अस्तित्व को समाप्त करके अथवा निष्प्रभावी बनाकर उसे अधिक लंबी रेखा खींचकर वह न सिर्फ सत्ता में बने रह सकते हैं बल्कि और अधिक मजबूती हासिल कर सकते हैं। भाजपा सत्ता में आई तो थी लोगों को और देश को अच्छे दिन लाने का भरोसा देकर लेकिन वह धीरे—धीरे कांग्रेस मुक्त भारत व अबकी बार 400 पार के नारे तक ही नहीं पहुंच गई बल्कि विपक्ष को दर्शक दीर्घा में बैठाने व विपक्ष विहीन सरकार बनाने तथा संविधान बदलने के नारे और दावो तक जा पहुंची? इस एक बीते दशक में सत्ता में बैठे लोगों ने मीडिया और मायावती को इतना अधिक डरा दिया कि मीडिया और मायावती की पार्टी बसपा की विश्वसनीयता और उपयोगिता को ही खत्म कर डाला। अब भले ही वह अखबार और टीवी चैनल जिन्हें मोदी मीडिया छाप बताया जाता है न उन्हें कोई पढ़ना चाहता है न देखना चाहता है और न ही अब उनका कोई प्रभाव आमजन मानस के मन में पड़ता है। सच कहा जाए तो अब सरकार के लिए भी यह गोदी मीडिया किसी काम का नहीं रह गया है। मायावती और उनकी पार्टी जिसको अल्पसंख्यकों की पार्टी माना जाता था उसका सारा जनाधार टूटकर या तो सपा के साथ चला गया या फिर कांग्रेस के साथ। भाजपा को पार्टी नेताओं की सोच का फायदा कितना हुआ यह तो पता नहीं लेकिन नुकसान इतना ज्यादा हुआ है कि भाजपा के नेता उसकी अब भरपाई नहीं कर सकते हैं। सरकार में बैठे नेताओं द्वारा सत्ता के प्रभाव के इस्तेमाल का ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाने के चक्कर में चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं के सामने भी जिस तरह की अविश्वसनीयता और अनउपयोगिता का संकट खड़ा कर दिया गया है उसे पुनः बहाल करने में अब उसे कई दशक लंबा समय लग जाएगा। देश की स्वायत्तता धारी तमाम संस्थाएं चाहे वह ईडी हो या सीबीआई या चुनाव आयोग सभी को एक ऐसे रिफॉर्म की जरूरत है जो केंद्रीय सत्ता में बड़े बदलाव के बाद ही संभव हो पाएगा। विपक्ष ने अब इस बात को अच्छे से जान समझ लिया है। बसपा ही नहीं अन्य अनेक ऐसे राजनीतिक दल है जिन्होंने बीते दशक में अपना अस्तित्व गंवाया है। क्यों गंवाया है यह भी उनकी समझ में आ चुका है। कांग्रेस जैसे बड़े दल जब इस दौर में रसातल में पहुंच गए तो छोटों की तो बात ही क्या करनी? अब सभी कांग्रेस के झंडे के नीचे एक साथ आते दिख रहे हैं। इसके संकेत लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता और बिहार में वोट अधिकार रैली की सफलता से मिलने शुरू हो गए हैं। भाजपा के नेता भले ही यह मानने को तैयार न सही कि उनसे कुछ तो गलतियां हुई लेकिन इन नेताओं में अंदर खाने कुछ बेचैनी तो देखी ही जा रही है। अगर देश में अब सत्ता परिवर्तन होगा तो देश की सरकार के सामने गंभीर चुनौतियों का पहाड़ खड़ा होगा यह भी सुनिश्चित माना जा रहा है।

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