- फुटपाथ बिके, यात्री सड़कों पर पैदल चलने को हैं मजबूर
- नगर निगम के दावे खोखले, पुलिस की चौकसी पर सवाल
- सवाल यह नहीं कब्जा है, सवाल यह है कि हटाता कौन नहीं
देहरादून। राजधानी देहरादून में यदि किसी को यह जानना हो कि प्रशासनिक व्यवस्था कितनी सक्रिय है, तो उसे किसी सरकारी रिपोर्ट की जरूरत नहीं। बस शहर के किसी भी प्रमुख फुटपाथ पर पांच मिनट खड़े हो जाइए। तस्वीर खुद बता देगी कि फुटपाथ अब पैदल यात्रियों के नहीं, बल्कि कब्जेदारों के हो चुके हैं। आम आदमी सड़क पर है और व्यवस्था फाइलों में। नगर निगम हर महीने अतिक्रमण हटाने के अभियान की तस्वीरें जारी करता है। पुलिस ट्रैफिक व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बताती है। सरकार स्मार्ट सिटी और सुशासन के दावे करती है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि राजधानी के अधिकांश फुटपाथों पर खुलेआम दुकानें सजी हैं और पैदल चलने वाला व्यक्ति अपनी जान हथेली पर रखकर सड़क पर चलने को मजबूर है।
देहरादून के घंटाघर से पल्टन बाजार, लालपुल से प्रिंस चौक, सहारनपुर रोड से राजपुर रोड और आईएसबीटी से बल्लूपुर सहित शहर की सभी सड़कों और फुटपाथों पर रोज दुकानें सजती हैं। यह कोई रातों-रात होने वाला कब्जा नहीं है। यह रोज होता है, सबकी आंखों के सामने होता है और फिर भी चलता रहता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल नगर निगम से है। आखिर जिन फुटपाथों की जिम्मेदारी उसके पास है, वे वर्षों से कब्जे में कैसे हैं? पुलिस से भी सवाल है कि जब ट्रैफिक पुलिस हर चौराहे पर मौजूद रहती है, तो सड़क पर उतरने को मजबूर पैदल यात्री उसे क्यों दिखाई नहीं देते? और सरकार से भी सवाल है कि क्या स्मार्ट सिटी का मतलब केवल सुंदर टाइलें बिछाना है, या उन पर आम नागरिक का अधिकार भी सुनिश्चित करना है?
राजधानी में अतिक्रमण हटाने के अभियान अब लोगों के बीच मजाक का विषय बनने लगे हैं। सुबह जेसीबी चलती है, दोपहर तक फोटो और प्रेस विज्ञप्ति जारी होती है और कुछ दिन बाद वहीं फिर वही दुकानें लग जाती हैं। यदि यही कार्रवाई है, तो फिर यह मानने में क्या संकोच कि समस्या कब्जेदारों से ज्यादा व्यवस्था की इच्छाशक्ति की है?
राजधानी के लालपुल में सिटी बस की चपेट में आए लोगों की घटना ने पूरे शहर को झकझोर दिया। दुर्घटना के कारणों की जांच अपने स्थान पर है, लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि जब फुटपाथ कब्जे में होंगे तो पैदल यात्री सड़क पर ही चलेंगे। और जब सड़क पर पैदल यात्री होंगे, तो हादसों का खतरा भी बढ़ेगा। यह केवल ट्रैफिक का मुद्दा नहीं, बल्कि शहरी नियोजन और प्रशासनिक जवाबदेही का भी सवाल है। शहर में वर्षों से एक सवाल गूंज रहा हैकृयदि रोज लगने वाले कब्जे अवैध हैं तो वह रोज लगते कैसे हैं? यदि वैध हैं तो फुटपाथों पर पैदल यात्रियों का अधिकार कहां गया? और यदि अवैध हैं, तो फिर कार्रवाई स्थायी क्यों नहीं होती? यही वह सवाल हैं जिनका जवाब न नगर निगम देता है, न पुलिस और न ही सरकार।
सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर सड़कें चौड़ी कर रही है, फुटपाथ बना रही है और शहर को आधुनिक बनाने के दावे कर रही है। लेकिन सबसे बुनियादी अधिकारकृसुरक्षित पैदल चलने का अधिकारकृआज भी नागरिकों को नहीं मिल पाया है। विडंबना यह है कि राजधानी में वाहन के लिए सड़क है, दुकान के लिए फुटपाथ है, लेकिन पैदल चलने वाले के लिए कोई जगह नहीं बची। आमजन का सवाल है कि क्या नगर निगम केवल चालान और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित रहेगा? क्या पुलिस की जिम्मेदारी केवल वाहनों का चालान काटने तक है? क्या सरकार स्मार्ट सिटी की रैंकिंग से आगे बढ़कर नागरिकों की सुरक्षा पर भी ध्यान देगी? क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही फुटपाथ पैदल यात्रियों को वापस मिलेंगे? अब इन प्रश्नों का उत्तर मांगे तो मांगे किससे।
यह सर्व विदित है कि फुटपाथ पर कब्जा केवल अतिक्रमण नहीं, बल्कि आम नागरिक के अधिकार पर कब्जा है। जब व्यवस्था अपनी आंखों के सामने सार्वजनिक स्थानों पर अवैध कब्जे होते देख भी मौन रहती है, तो सवाल केवल प्रशासनिक विफलता का नहीं, बल्कि शासन की प्राथमिकताओं का भी बन जाता है। राजधानी के लोग अब यह नहीं पूछ रहे कि फुटपाथ पर कब्जा किसने किया। वह यह पूछ रहे हैं कि फुटपाथ आखिर खाली कौन नहीं कराना चाहता?




