- जनता पूछेगी कहां है रोजगार, पलायन और विकास का हिसाब
- भाजपा गिनाएगी उपलब्धियां, कांग्रेस उठाएगी अधूरे वादों का मुद्दा
- उत्तराखंड के चुनावी रण में जनता बनेगी सबसे बड़ी निर्णायक
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही प्रदेश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। भाजपा जहां अपने दस वर्षों के शासनकाल की उपलब्धियों को जनता के सामने रखने की तैयारी कर रही है, वहीं कांग्रेस सरकार के अधूरे वादों और जमीनी समस्याओं को चुनावी हथियार बनाने में जुट गई है। राजनीतिक दलों ने संगठनात्मक तैयारियां तेज कर दी हैं और चुनावी रणनीति का केंद्र अब जनता से किए गए वादों का हिसाब-किताब बनने लगा है।
प्रदेश में रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा, सड़कों की स्थिति, पर्वतीय क्षेत्रों में खाली होते गांव, महंगाई और किसानों की समस्याएं ऐसे मुद्दे हैं जिन पर विपक्ष सरकार को घेरने की तैयारी कर रहा है। कांग्रेस का आरोप है कि पिछले चुनावों में किए गए कई बड़े वादे आज भी धरातल पर पूरी तरह नहीं उतर पाए हैं। दूसरी ओर भाजपा का दावा है कि चारधाम ऑल वेदर रोड, रेल परियोजनाएं, निवेश, पर्यटन और बुनियादी ढांचे के विकास के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य हुए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव केवल नए वादों का नहीं बल्कि पुराने वादों के मूल्यांकन का चुनाव होगा। राज्य गठन के 26 वर्ष बाद भी पहाड़ से पलायन एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। कई गांव आबादी खो चुके हैं और रोजगार की तलाश में युवा मैदानों और महानगरों की ओर जा रहे हैं। ऐसे में विपक्ष इन मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी में है।
उत्तराखंड में बेरोजगारी हमेशा से चुनावी विमर्श का हिस्सा रही है। सरकारी नौकरियों में भर्ती प्रक्रिया, पेपर लीक प्रकरण और निजी क्षेत्र में सीमित अवसरों को लेकर युवाओं में असंतोष समय-समय पर सामने आता रहा है। विपक्ष इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। वहीं भाजपा भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और नए रोजगार अवसरों को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश करेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव के करीब आते-आते क्षेत्रीय असंतुलन का मुद्दा भी फिर जोर पकड़ सकता है। पर्वतीय जिलों में स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क सुविधाओं को लेकर उठते सवाल चुनावी बहस का हिस्सा बनेंगे। वहीं मैदानी क्षेत्रों में शहरीकरण, ट्रैफिक, भूमि और कानून-व्यवस्था के मुद्दे चर्चा में रहेंगे।
भाजपा ने 2027 की तैयारियों को लेकर बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने की रणनीति शुरू कर दी है। पार्टी का लक्ष्य लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का है। इसके लिए हारे हुए बूथों पर विशेष फोकस किया जा रहा है। उधर कांग्रेस संगठन को मजबूत करने के साथ-साथ जनता के बीच सरकार की कथित विफलताओं को ले जाने की तैयारी में है। पार्टी नेताओं का मानना है कि सत्ता विरोधी माहौल और अधूरे वादे उनके लिए राजनीतिक अवसर बन सकते हैं।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि 2027 के चुनाव में घोषणापत्रों से ज्यादा चर्चा उन वादों की होगी जो पहले किए गए थे। जनता यह जानना चाहेगी कि रोजगार के कितने अवसर बने, पलायन कितना रुका, स्वास्थ्य सेवाएं कितनी बेहतर हुईं और पहाड़ों का विकास कितना आगे बढ़ा। ऐसे में चुनावी जंग विकास के दावों और अधूरे वादों के बीच सिमटती दिखाई दे रही है। उत्तराखंड की राजनीति में अगले कुछ महीनों में बयानबाजी और तेज होगी, लेकिन अंतिम फैसला जनता करेगी, जो इस बार नेताओं से नए सपनों से ज्यादा पुराने वादों का हिसाब मांगती नजर आ रही है।




