- जांच की प्रगति, कथित वीआईपी पहलू पर जवाब मांगने की तैयारी
देहरादून। अंकिता भंडारी हत्याकांड को चार साल पूरे होने जा रहे हैं, लेकिन यह मामला उत्तराखंड की सामूहिक चेतना से अभी बाहर नहीं हुआ है। अंकिता की चौथी पुण्यतिथि से पहले राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने एक बार फिर आवाज बुलंद करनी शुरू कर दी है। 18 सितंबर को देहरादून के परेड ग्राउंड में श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जा रही है, जिसमें उत्तराखंड महिला मंच, इंसानियत मंच और अंकिता भंडारी न्याय समूह सहित विभिन्न संगठनों से जुड़े लोगों के पहुंचने की बात कही गई है।
अंकिता प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल लंबे समय से कथित वीआईपी एंगल को लेकर उठता रहा है। विभिन्न सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों का कहना है कि मामले से जुड़े सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जांच की प्रगति सार्वजनिक की जानी चाहिए। अगस्त में कांग्रेस ने भी सीबीआई जांच की प्रगति जनता के सामने रखने की मांग उठाई थी। हालांकि, इन राजनीतिक आरोपों और दावों की स्वतंत्र पुष्टि अलग-अलग स्तर पर आवश्यक है।
अंकिता की न्याय की मांग को लेकर आंदोलन पहले भी कई चरणों में सामने आया है। जनवरी 2026 में विभिन्न सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों ने देहरादून में मुख्यमंत्री आवास कूच किया था। इसमें राज्य आंदोलनकारी मंच, कांग्रेस, उत्तराखंड क्रांति दल, वाम दलों, बेरोजगार संगठनों और अन्य सामाजिक समूहों के लोग शामिल हुए थे। प्रदर्शनकारियों ने मामले की जांच और कथित वीआईपी पहलू को लेकर स्पष्टता की मांग की थी। इसके बाद उत्तराखंड बंद का आह्वान भी किया गया था। श्रीनगर, श्रीकोट, रुड़की और नई टिहरी सहित कई स्थानों पर बंद और विरोध कार्यक्रम हुए। आंदोलन से जुड़े संगठनों की प्रमुख मांगों में जांच की पारदर्शिता और कथित वीआईपी पहलू को स्पष्ट करना शामिल रहा। अंकिता मामले में अगस्त 2026 में महिला कांग्रेस ने भी मुख्यमंत्री आवास कूच किया था। कार्यकर्ताओं ने न्याय की राखी लेकर मुख्यमंत्री आवास जाने का प्रयास किया, जिन्हें हाथीबड़कला बैरिकेडिंग पर रोक दिया गया। बाद में सिटी मजिस्ट्रेट को ज्ञापन सौंपा गया।
मामले की कानूनी पैरवी से जुड़ा विवाद भी हाल में सामने आया है। अंकिता भंडारी मामले में हाईकोर्ट में पैरवी कर रहे अधिवक्ता नवनीश नेगी को कथित धमकी मिलने के बाद अधिवक्ताओं ने बैठक कर चिंता जताई और कार्रवाई की मांग की। यह घटना न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोगों की सुरक्षा के सवाल को भी सामने लाती है। अंकिता प्रकरण अब महज एक आपराधिक मामले की सीमाओं में नहीं रहा। इसके साथ उत्तराखंड में महिलाओं की सुरक्षा, रोजगार के लिए घर से बाहर निकलने वाली युवतियों की सुरक्षा, सत्ता और प्रभावशाली लोगों की जवाबदेही तथा जांच एजेंसियों पर जनता के भरोसे जैसे सवाल भी जुड़े हैं।
यही वजह है कि चार साल बाद भी अंकिता का नाम उत्तराखंड में आंदोलनों और राजनीतिक बहस के केंद्र में बना हुआ है। पुण्यतिथि पर होने वाली श्रद्धांजलि सभा के जरिए संगठन एक बार फिर सरकार और जांच एजेंसी के सामने अपने सवाल रखने की तैयारी में हैं। अब निगाह इस बात पर होगी कि आने वाले समय में जांच की प्रगति और मामले से जुड़े लंबित सवालों पर आधिकारिक स्तर से क्या स्पष्टता सामने आती है।




