September 29, 2026यूपीआई केवल भुगतान का माध्यम नहीं रहा है, यह भारत की रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था की धड़कन बन चुका है। चाय की दुकान से लेकर बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठान तक और गांव के छोटे दुकानदार से लेकर महानगरों के बाजार तक, डिजिटल भुगतान ने नकदी की निर्भरता को तेजी से कम किया है। ऐसे समय में यूपीआई के चुनिंदा लेनदेन पर शुल्क लगाने का फैसला स्वाभाविक रूप से गंभीर बहस का विषय है। यही वजह है कि सर्वाेच्च न्यायालय ने भी इस व्यवस्था के कानूनी आधार पर केंद्र से जवाब मांगा है। हालांकि अदालत ने फिलहाल शुल्क पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया है। सरकार का तर्क है कि यह शुल्क आम उपभोक्ता से नहीं लिया जाएगा। व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले यूपीआई लेनदेन पूरी तरह निशुल्क रहेंगे और 2,000 तक के अनेक व्यापारी भुगतान भी शुल्क से बाहर रहेंगे। सरकार के अनुसार करीब 96 प्रतिशत व्यापारी लेनदेन इस बदलाव से प्रभावित नहीं होंगे। प्रस्तावित व्यवस्था में 2,000 से अधिक के निर्दिष्ट व्यापारी लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर लागू होगा। सरकार इसे कर नहीं, बल्कि भुगतान व्यवस्था में शामिल संस्थाओं के बीच वितरित होने वाला शुल्क बता रही है। लेकिन असली सवाल यही है कि जिस शुल्क का भुगतान व्यापारी करेगा, उसका अंतिम बोझ आखिर किस पर पड़ेगा? कागज पर कहा जा सकता है कि व्यापारी ग्राहक से अतिरिक्त पैसा नहीं वसूल सकता। मगर बाजार केवल सरकारी अधिसूचनाओं से नहीं चलता। व्यापार की लागत बढ़ेगी तो उसकी भरपाई के रास्ते भी तलाशे जाएंगे। कहीं कीमतों में मामूली वृद्धि हो सकती है, कहीं व्यापारी नकद भुगतान को प्रोत्साहित कर सकता है और कहीं डिजिटल भुगतान की सुविधा सीमित करने की कोशिश हो सकती है। यही वह बिंदु है जहां सरकार को सबसे अधिक सावधानी बरतने की जरूरत है। व्यापारिक संगठनों ने भी लागत बढ़ने और नकद भुगतान की ओर लौटने की आशंका जताई है। यूपीआई की सबसे बड़ी ताकत उसकी सरलता और निशुल्क उपलब्धता रही है। भारत ने दुनिया के सामने डिजिटल भुगतान का एक ऐसा मॉडल खड़ा किया, जिसमें छोटे से छोटा भुगतान भी बिना अतिरिक्त शुल्क के संभव हुआ। इसने वित्तीय समावेशन को गति दी और करोड़ों लोगों को औपचारिक डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ा। अब यदि इसी व्यवस्था में शुल्क की शुरुआत होती है तो यह केवल 0.4 प्रतिशत की गणित नहीं है। यह उस भरोसे का सवाल है, जो वर्षों में यूपीआई ने बनाया है। सरकार के सामने दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न भी है कि यूपीआई के संचालन की लागत आखिर कितनी है और उसकी भरपाई का सबसे उचित तरीका क्या है? यदि शुल्क जरूरी है तो इसकी गणना, लागत, वितरण और उपयोग का पूरा ढांचा सार्वजनिक होना चाहिए। सर्वाेच्च न्यायालय का यही सवाल महत्वपूर्ण है कि इस शुल्क का वैधानिक आधार क्या है। सरकार से इस पर स्पष्ट जवाब मांगना व्यवस्था में पारदर्शिता की आवश्यकता को रेखांकित करता है। यह भी ध्यान रखना होगा कि यूपीआई की सफलता में सरकार, बैंकों, भुगतान सेवा प्रदाताओं और निजी अनुप्रयोगों सभी की भूमिका रही है। इसलिए इसका आर्थिक बोझ तय करते समय केवल बड़े व्यापारियों या भुगतान कंपनियों के हित नहीं, बल्कि छोटे दुकानदार, ग्राहक और डिजिटल अर्थव्यवस्था में नए-नए जुड़े वर्ग भी केंद्र में होने चाहिए। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुल्क लगाने की शुरुआत कहीं धीरे-धीरे शुल्क बढ़ाने की राह न बन जाए। आज 2,000 से अधिक के चुनिंदा व्यापारी भुगतान पर शुल्क है, कल इसकी सीमा या दर बदलने की मांग उठ सकती है। इसलिए सरकार को अभी से स्पष्ट और दीर्घकालिक नीति सामने रखनी होगी। भारत को डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर ले जाने के बाद अब उसे उसकी लागत का बोझ जनता और छोटे व्यापारियों पर डालकर कमजोर नहीं किया जा सकता। यदि यूपीआई की वित्तीय स्थिरता के लिए शुल्क आवश्यक है तो उसका औचित्य, सीमा और सुरक्षा-तंत्र पारदर्शी होना चाहिए और यदि यह शुल्क वास्तव में आम उपभोक्ता पर नहीं पड़ेगा, तो सरकार को इसे व्यवहार में सुनिश्चित करने की ठोस व्यवस्था भी दिखानी होगी। यूपीआई को राजस्व का साधन बनाने से पहले यह याद रखना होगा कि इसकी सबसे बड़ी पूंजी पैसा नहीं, भरोसा है। छह साल तक निशुल्क डिजिटल भुगतान की आदत डालने के बाद शुल्क की दस्तक केवल आर्थिक फैसला नहीं है। यह डिजिटल भारत के भविष्य की दिशा तय करने वाला फैसला है। उसका कानूनी और आर्थिक आधार क्या है? सरकार को इसका जवाब केवल अदालत को नहीं, उस करोड़ों आबादी को भी देना होगाए जिसने यूपीआई पर भरोसा किया है।