भारत में 95 साल बाद जातियों की गिनती का सवाल केवल जनगणना की प्रक्रिया में बदलाव नहीं है, बल्कि यह देश की राजनीति, सामाजिक व्यवस्था और सत्ता में हिस्सेदारी की बहस को नए सिरे से खड़ा करने वाला घटनाक्रम है। वर्ष 1931 के बाद पहली बार देशव्यापी जनगणना में सभी जातियों की गणना की जा रही है। स्वतंत्र भारत में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की गणना होती रही है, लेकिन सभी जातियों की व्यापक गणना नहीं हुई थी। अब करीब एक सदी बाद देश की जातिगत संरचना की नई तस्वीर सामने आने की उम्मीद है। यह आंकड़ों का सवाल जरूर है, लेकिन इसके भीतर सामाजिक न्याय, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अवसरों की समानता का बड़ा प्रश्न छिपा है। जनगणना का दूसरा चरण 25 जनवरी से 28 फरवरी 2027 तक चलने की जानकारी सामने आई है। इस बार 40 सवाल पूछे जाने की बात कही जा रही है। लेकिन इन सवालों के बीच सबसे बड़ा सवाल सरकार और राजनीतिक व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए कि क्या देश जातियों की संख्या जानने के बाद उन असमानताओं का हिसाब भी करेगा, जो पीढ़ियों से समाज के एक बड़े हिस्से को पीछे धकेलती रही हैं? जाति भारतीय समाज की वह सच्चाई है, जिसे राजनीतिक दल चुनाव के समय कभी स्वीकार करते हैं, कभी नकारते हैं और कभी अपने हिसाब से परिभाषित करते हैं। टिकट वितरण से लेकर मंत्रिमंडल गठन, सामाजिक समीकरणों से लेकर चुनावी घोषणाओं तक जाति की भूमिका दिखाई देती है। फिर भी जब जातियों की वास्तविक संख्या और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति जानने की बात आती है, तो बहस राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में उलझ जाती है। जाति का चुनावी गणित साधने वाली राजनीति के सामने अब यह चुनौती है कि वह सामाजिक न्याय के वास्तविक गणित से भी सामना करे। जातिवार गणना के समर्थकों का तर्क है कि जब तक विभिन्न समुदायों की वास्तविक संख्या और स्थिति का विश्वसनीय आकलन नहीं होगा, तब तक उनके लिए नीतियां बनाने और अवसरों की असमानता को दूर करने की प्रक्रिया अधूरी रहेगी। यह तर्क महत्वपूर्ण है। आखिर जिस समाज की संरचना के बारे में पर्याप्त आंकड़े ही उपलब्ध न हों, उसकी समस्याओं का सटीक समाधान कैसे तैयार किया जा सकता है? लेकिन यहां एक और सावधानी जरूरी है। किसी जाति की आबादी अधिक होने का अर्थ यह नहीं कि वह सामाजिक और आर्थिक रूप से संपन्न भी है। इसी तरह कम आबादी किसी समुदाय की वंचना का अपने आप में प्रमाण नहीं है। शिक्षा, रोजगार, आय, भूमि, स्वास्थ्य और सार्वजनिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व के आंकड़ों के साथ जातिगत गणना का विश्लेषण होगा, तभी तस्वीर पूरी होगी। सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि किस जाति की आबादी कितनी है। सवाल यह भी होना चाहिए कि किस समुदाय के कितने बच्चे उच्च शिक्षा तक पहुंच पा रहे हैं, किन समूहों को रोजगार के अवसर कम मिल रहे हैं, किन क्षेत्रों में सामाजिक पिछड़ापन बना हुआ है और सरकारी योजनाओं का लाभ किन तक नहीं पहुंच पा रहा है। आबादी गिनना पहला कदम है। अवसरों की असमानता का हिसाब लेना अगला और कहीं अधिक कठिन कदम। जाति जनगणना के आंकड़े सामने आने पर राजनीतिक दलों के लिए अपने सामाजिक आधार और प्रतिनिधित्व के दावों की समीक्षा से बचना आसान नहीं होगा। जो दल सामाजिक न्याय की बात करते हैं, उन्हें बताना होगा कि उनके संगठन, उम्मीदवारों के चयन और सत्ता में भागीदारी में यह सिद्धांत कितना दिखाई देता है, जो दल विकास को अपनी प्राथमिकता बताते हैं, उन्हें यह भी स्पष्ट करना होगा कि विकास का लाभ समाज के अलग-अलग वर्गों तक किस अनुपात में पहुंचा है। यहां केंद्र सरकार की जिम्मेदारी सबसे बड़ी होगी। उसे गणना की पद्धति, आंकड़ों की विश्वसनीयता, निजता की सुरक्षा और परिणामों के उपयोग को लेकर स्पष्टता रखनी होगी। विपक्ष को भी केवल आंकड़ों की मांग या सरकार की आलोचना तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे यह बताना होगा कि जातिवार आंकड़ों के आधार पर शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की नीतियों में क्या बदलाव किए जाने चाहिए। जाति जनगणना को किसी एक दल की राजनीतिक जीत या हार के रूप में देखना भी गलत होगा। यह राष्ट्रीय महत्व का विषय है। यदि आंकड़े केवल चुनावी भाषणों, जातिगत धु्रवीकरण और सत्ता के नए समीकरण बनाने में इस्तेमाल हुए, तो देश को आंकड़ों का भंडार तो मिलेगा, लेकिन सामाजिक न्याय की दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं होगी। प्रस्तावित कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर को संभावित विधानसभा चुनावों के मद्देनजर अलग रखने की बात कही गई है। वहीं बर्फबारी प्रभावित लद्दाख, जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के लिए भी अलग व्यवस्था की जरूरत बताई जा रही है। इन परिस्थितियों में अलग समय-सारिणी प्रशासनिक दृष्टि से व्यावहारिक हो सकती है, लेकिन इसके पीछे के आधार और आगे की प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए। जनगणना जैसे राष्ट्रीय कार्य की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि नागरिकों को पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी दिखाई दे। राज्यों में समय का अंतर हो सकता है, लेकिन आंकड़ों की गुणवत्ता, गणना के मानक और परिणामों की राष्ट्रीय स्तर पर तुलनीयता से समझौता नहीं होना चाहिए। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि चुनावी गतिविधियों या कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण किसी क्षेत्र की आबादी गणना से छूट न जाए। 95 साल बाद सभी जातियों की व्यापक गणना का अवसर देश को अपनी सामाजिक संरचना समझने का नया आधार दे सकता है। यह उन दावों की जांच का मौका भी है, जिनके सहारे राजनीतिक दल दशकों से विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधित्व और कल्याण की बात करते आए हैं। मगर इस प्रक्रिया की सफलता केवल गणना पूरी होने या आंकड़े जारी होने से तय नहीं होगी। असली सवाल यह है कि जातियों की गिनती के बाद क्या सत्ता अपनी नीतियों का हिसाब देने को तैयार होगी? क्या आंकड़े उन बच्चों के लिए बेहतर शिक्षा का रास्ता खोलेंगे, जिन्हें अवसर नहीं मिले? क्या वे उन युवाओं के लिए रोजगार और प्रतिनिधित्व की बहस को मजबूत करेंगे, जो व्यवस्था में अपनी जगह तलाश रहे हैं? क्या सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों की समस्याओं को चुनावी घोषणाओं से निकालकर ठोस नीतियों तक पहुंचाया जाएगा? जातियों की गिनती इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकती है, लेकिन सामाजिक न्याय की मंजिल नहीं। मंजिल तब आएगी, जब आंकड़ों के आधार पर अवसरों की खाई कम होगी, भेदभाव कमजोर पड़ेगा और हर नागरिक को अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने का समान अवसर मिलेगा। यही 95 साल बाद होने वाली इस ऐतिहासिक कवायद की असली कसौटी है।





