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‘ऐतिहासिक’ दावे पर युवाओं की ‘शंका’

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  • संसद से पारित हुआ एंटी पेपर लीक बिल, पर युवाओं का सवाल
  • कानून की सख्ती से खत्म होगी साठगांठ या फिर वही पुराना खेल
  • कानून पास हुआ, भाजपा ने देशभर में बजा दी है जीत की तालियां

देहरादून। लोकसभा में एंटी पेपर लीक कानून संशोधन विधेयक पारित होते ही भाजपा ने इसे युवाओं के भविष्य की सुरक्षा की दिशा में ऐतिहासिक और निर्णायक कदम बताया। पार्टी नेताओं ने दावा किया कि अब परीक्षा माफिया की कमर टूट जाएगी, नकल उद्योग पर ताला लग जाएगा और मेहनत करने वाले युवाओं को न्याय मिलेगा। लेकिन संसद से लेकर सड़कों तक गूंजता एक सवाल अभी भी वहीं खड़ा है क्या केवल कानून बन जाने से युवाओं का टूटा हुआ भरोसा लौट आएगा?
राजनीति में कानून पारित होने के बाद अक्सर जश्न मनाया जाता है। इस बार भी वही हुआ। भाजपा के प्रवक्ताओं ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस नीति का हिस्सा बताया। सोशल मीडिया पर युवाओं की जीत और पेपर माफिया की हार जैसे संदेश चलने लगे। लेकिन इन नारों के बीच देश का वह अभ्यर्थी कहीं दिखाई नहीं दिया, जिसने पिछले पांच वर्षों में दो-दो, तीन-तीन बार एक ही परीक्षा की तैयारी की और हर बार पेपर लीक की खबर सुनकर फिर से शून्य पर लौट आया।
पेपर लीक का दर्द आंकड़ों में नहीं मापा जा सकता। यह उस छात्र की आंखों में दिखता है, जो सुबह चार बजे उठकर पढ़ता है। यह उस पिता के माथे की लकीरों में दिखाई देता है, जिसने बेटे की कोचिंग के लिए खेत गिरवी रख दिया। यह उस बेटी की चुप्पी में सुनाई देता है, जिसने नौकरी की उम्मीद में अपनी उम्र के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष किताबों के बीच गुजार दिए। ऐसे युवाओं के लिए संसद में कानून बनना उम्मीद जरूर है, लेकिन भरोसा नहीं। भरोसा तब लौटेगा, जब परीक्षा समय पर होगी, प्रश्नपत्र सुरक्षित रहेगा और परिणाम बिना विवाद के घोषित होंगे।
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक पक्ष भी है। भाजपा इसे अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है, जबकि विपक्ष पूछ रहा है कि आखिर ऐसी नौबत आई ही क्यों? यदि वर्षों से लगातार पेपर लीक हो रहे थे, भर्ती परीक्षाएं रद्द हो रही थीं और माफिया सक्रिय थे, तो क्या व्यवस्था पहले सो रही थी? क्या केवल कानून बना देने से उन संस्थागत कमियों पर पर्दा पड़ जाएगा, जिन्होंने इस अपराध को फलने-फूलने दिया?
कानून जितना कठोर है, उतनी ही कठोर परीक्षा अब सरकार की भी होगी। क्योंकि पेपर लीक किसी बंद कमरे में नहीं होता। इसके पीछे प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर छपाई, परिवहन, डिजिटल सर्वर, परीक्षा केंद्र और प्रशासनिक निगरानी तक पूरी एक श्रृंखला होती है। यदि इस श्रृंखला की कमजोर कड़ियां नहीं सुधरेंगी, तो कानून की धार भी कुंद पड़ सकती है।
उत्तराखंड इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा है। भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियों ने हजारों युवाओं को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर किया। जांच हुई, गिरफ्तारियां हुईं, एसटीएफ सक्रिय हुई, लेकिन युवाओं के मन में जो अविश्वास पैदा हुआ, वह आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। यही कहानी देश के कई अन्य राज्यों में भी दोहराई गई। भाजपा का यह कहना सही है कि अपराधियों को कठोर सजा मिलनी चाहिए। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि उन अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हो, जिनकी लापरवाही या मिलीभगत से पेपर लीक होता है। यदि हर बार केवल बिचौलिये पकड़े जाएंगे और व्यवस्था के भीतर बैठे जिम्मेदार लोग बच निकलेंगे, तो कानून का संदेश अधूरा रह जाएगा।
लोकतंत्र में कानून बनाना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन व्यवस्था में विश्वास पैदा करना सबसे कठिन काम है। युवाओं को संसद की कार्यवाही से अधिक अगली भर्ती परीक्षा की चिंता है। उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि किस दल ने श्रेय लिया, उन्हें यह जानना है कि अगली बार उनका प्रश्नपत्र सुरक्षित रहेगा या नहीं। भाजपा इस विधेयक को अपनी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में जनता के बीच ले जाएगी। विपक्ष इसकी पृष्ठभूमि और पूर्व की विफलताओं को मुद्दा बनाएगा। लेकिन चुनावी भाषणों और प्रेस कान्फ्रेंसों से अलग, देश का युवा केवल एक जवाब चाहता है क्या अब उसकी मेहनत बिकेगी नहीं? यही वह सवाल है, जिसका उत्तर किसी प्रेस विज्ञप्ति, किसी नारे या किसी सोशल मीडिया अभियान में नहीं मिलेगा। इसका उत्तर मिलेगा अगली परीक्षा के दिन। जब परीक्षा समय पर होगी, पेपर लीक नहीं होगा और चयन केवल योग्यता के आधार पर होगा।
लोकसभा ने कानून पास कर दिया है। भाजपा खुश है। विपक्ष सवाल पूछ रहा है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा निर्णायक न संसद होगी, न राजनीतिक दल। निर्णायक होगा वह युवा, जो अगली भर्ती परीक्षा के बाद पहली बार कह सके इस बार मेरी मेहनत सचमुच मेरी थी।

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