कामनवेल्थ गेम्स 2026 में पदक जीतकर एक बार फिर यह साबित कर दिया कि देश का खेल जगत अब केवल क्रिकेट तक सीमित नहीं रहा। सबसे प्रेरणादायक उपलब्धि पैरा एथलेटिक्स में शर्मिला का स्वर्ण पदक है, जिसने 20 वर्षों से चले आ रहे गोल्ड के सूखे को समाप्त कर दिया। यह जीत केवल एक खिलाड़ी की सफलता नहीं, बल्कि उस भारत की तस्वीर है जो कठिन परिस्थितियों से निकलकर दुनिया के मंच पर अपनी नई पहचान गढ़ रहा है। पिछले एक दशक में भारत के खेल ढांचे में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिले हैं। खेलों को अब केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण और युवाओं के सशक्तिकरण के माध्यम के रूप में देखा जाने लगा है। खेलो इंडिया, टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम और आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाओं जैसी पहलों ने खिलाड़ियों को बेहतर अवसर दिए हैं। इसका परिणाम यह है कि भारत अब केवल कुछ चुनिंदा खेलों में नहीं, बल्कि एथलेटिक्स, बैडमिंटन, मुक्केबाजी, कुश्ती और पैरा स्पोर्ट्स में भी विश्व स्तर पर चुनौती पेश कर रहा है। शर्मिला की स्वर्णिम सफलता इसलिए भी विशेष है क्योंकि पैरा खिलाड़ियों को लंबे समय तक वह सम्मान और संसाधन नहीं मिल सके, जिसके वे हकदार थे। शारीरिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने जिस दृढ़ इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास का परिचय दिया, वह करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा है। यह संदेश भी स्पष्ट है कि प्रतिभा किसी शारीरिक सीमा की मोहताज नहीं होती। आवश्यकता केवल अवसर, प्रशिक्षण और समाज के सहयोग की होती है। हालांकि इन उपलब्धियों के बीच कुछ गंभीर प्रश्न भी सामने आते हैं। क्या देश के हर राज्य में खिलाड़ियों को समान सुविधाएं मिल रही हैं? क्या ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों की प्रतिभाओं तक आधुनिक खेल अवसंरचना पहुंच पाई है? उत्तराखंड, हिमाचल, पूर्वाेत्तर और आदिवासी क्षेत्रों में आज भी अनेक प्रतिभाएं संसाधनों के अभाव में राष्ट्रीय स्तर तक नहीं पहुंच पातीं। यदि भारत को वैश्विक खेल महाशक्ति बनना है तो खेल सुविधाओं का विकेंद्रीकरण करना होगा और जिला स्तर तक उत्कृष्ट प्रशिक्षण व्यवस्था विकसित करनी होगी। कामनवेल्थ गेम्स में लगातार बढ़ता भारत का प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि देश की खेल संस्कृति बदल रही है। लेकिन केवल पदक जीतना ही अंतिम लक्ष्य नहीं होना चाहिए। खेलों के माध्यम से अनुशासन, स्वास्थ्य, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता को भी मजबूत करना उतना ही आवश्यक है। स्कूलों और विश्वविद्यालयों में खेलों को परीक्षा आधारित शिक्षा जितनी ही प्राथमिकता देने की जरूरत है। पैरा खिलाड़ियों की सफलता समाज की सोच बदलने का भी अवसर है। अक्सर दिव्यांग खिलाड़ियों को सहानुभूति की दृष्टि से देखा जाता है, जबकि उनकी उपलब्धियां बताती हैं कि उन्हें दया नहीं, समान अवसर और सम्मान चाहिए। यदि सरकार, खेल संघ और निजी क्षेत्र मिलकर पैरा स्पोर्ट्स में निवेश बढ़ाएं तो भारत आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र में विश्व की अग्रणी शक्तियों में शामिल हो सकता है। भारत के लिए यह भी समय है कि खेल प्रशासन को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाए। खिलाड़ियों के चयन, कोचिंग और संसाधनों के वितरण में निष्पक्षता सुनिश्चित करनी होगी। कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी आज भी प्रशासनिक अव्यवस्थाओं और वित्तीय कठिनाइयों से जूझते हैं। यदि इन बाधाओं को दूर कर दिया जाए तो पदकों की संख्या स्वतः बढ़ेगी। कामनवेल्थ गेम्स 2026 के पांचवें दिन के छह पदक और शर्मिला का स्वर्ण पदक केवल आंकड़े नहीं हैं। ये उस बदलते भारत के प्रतीक हैं, जो संघर्ष को सफलता में बदलना जानता है। यह उपलब्धि हमें गर्व तो देती ही है, साथ ही यह जिम्मेदारी भी सौंपती है कि खेलों को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए। यदि यही गति और प्रतिबद्धता बनी रही तो आने वाले ओलंपिक और अन्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का तिरंगा और अधिक बार सबसे ऊंचे मंच पर लहराता दिखाई देगा। शर्मिला की जीत ने बीस वर्षों का इंतजार समाप्त किया है। अब आवश्यकता इस बात की है कि यह स्वर्णिम क्षण किसी अपवाद के रूप में नहीं, बल्कि भारत की नई खेल परंपरा की शुरुआत के रूप में याद किया जाए।




