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इतिहास रचने की हैट्रिक बनाम एंटी-इन्कंबेंसी

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  • भाजपा और कांग्रेस में शह-मात का खेल अभी से हुआ शुरू
  • तीसरे विकल्प की तलाश में छटपटाती देवभूमि की राजनीति
  • दिल्ली दूर, गांवों व बूथों से तय होगा उत्तराखंड का महासमर

देहरादून। प्रदेश की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है। सत्ता की राह दिल्ली से नहीं, बल्कि गांवों, बूथों और कार्यकर्ताओं के मन से होकर गुजरती है। 2027 की चुनावी शतरंज में मोहरे सजने शुरू हो गए हैं, लेकिन बाजी कौन जीतेगा, इसका फैसला आने वाले महीनों में कार्यकर्ताओं के मूड और जनता के मन से तय होगा। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव-2027 अभी समय है, लेकिन प्रदेश की राजनीति पूरी तरह चुनावी मोड में आ चुकी है। सत्तारूढ़ भाजपा तीसरी बार लगातार सत्ता में लौटने का इतिहास रचने की तैयारी में है, तो कांग्रेस एक बार फिर सत्ता विरोधी माहौल को भुनाने की रणनीति बना रही है। वहीं, क्षेत्रीय दल और नए राजनीतिक विकल्प भी अपने लिए जमीन तलाश रहे हैं। इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रदेश का राजनीतिक समीकरण किस करवट बैठेगा और कार्यकर्ताओं का मूड क्या कह रहा है?
प्रदेश में भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका मजबूत संगठन और बूथ स्तर तक फैला नेटवर्क है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार विकास, समान नागरिक संहिता, निवेश और बुनियादी ढांचे के मुद्दों को चुनावी नैरेटिव बनाने की तैयारी में है। लेकिन पार्टी के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। कई विधायकों की सार्वजनिक नाराजगी, नौकरशाही के बढ़ते प्रभाव को लेकर असंतोष और टिकट कटने की आशंकाओं ने संगठन के भीतर बेचौनी पैदा कर दी है। भाजपा के कार्यकर्ताओं का एक वर्ग यह मानता है कि सरकार की योजनाएं जनता तक पहुंची हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को अपेक्षित महत्व नहीं मिल पाया है। पार्टी के अंदर यह चर्चा भी तेज है कि 2027 में बड़े पैमाने पर टिकट परिवर्तन हो सकता है। ऐसे में कई मौजूदा विधायक और दावेदार अपने-अपने क्षेत्रों में राजनीतिक ताकत दिखाने में जुट गए हैं।
कांग्रेस के लिए 2027 सत्ता में वापसी का बड़ा अवसर माना जा रहा है। पार्टी सत्ता विरोधी रुझान, बेरोजगारी, महंगाई, पलायन और स्थानीय मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। लेकिन कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती उसकी आंतरिक गुटबाजी और नेतृत्व का सवाल है। पार्टी के कार्यकर्ता यह मानते हैं कि यदि समय रहते संगठनात्मक एकजुटता नहीं दिखाई गई तो भाजपा के खिलाफ माहौल बनने के बावजूद चुनावी लाभ उठाना मुश्किल होगा। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में उत्साह जरूर है, लेकिन वह स्पष्ट रणनीति और मजबूत नेतृत्व का इंतजार भी कर रहे हैं। पार्टी की चुनावी संभावनाएं काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेंगी कि वह अपने भीतर के मतभेदों को कितना नियंत्रित कर पाती है।
उत्तराखंड क्रांति दल एक बार फिर क्षेत्रीय अस्मिता, मूल निवास, भू-कानून और पलायन जैसे मुद्दों को लेकर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। हालांकि संगठनात्मक कमजोरी और सीमित जनाधार उसके सामने बड़ी चुनौती हैं। फिर भी यदि राज्य में त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति बनती है, तो कुछ सीटों पर क्षेत्रीय दलों की भूमिका निर्णायक हो सकती है। राजनीतिक दलों की रणनीति का केंद्र इस बार युवा मतदाता हैं। रोजगार, स्वरोजगार, शिक्षा और तकनीकी अवसरों के मुद्दे युवाओं के बीच सबसे अधिक चर्चा में हैं। महिला मतदाताओं के बीच सरकारी योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े मुद्दों का असर देखने को मिल सकता है, जबकि पहाड़ से पलायन कर चुके मतदाताओं को भी चुनावी विमर्श में शामिल करने की कोशिशें शुरू हो गई हैं।
जमीनी स्तर पर भाजपा कार्यकर्ताओं में सरकार की उपलब्धियों को लेकर आत्मविश्वास है, लेकिन स्थानीय नेतृत्व और संगठनात्मक समन्वय को लेकर कुछ असंतोष भी दिखाई देता है। दूसरी ओर कांग्रेस कार्यकर्ता भाजपा विरोधी माहौल की उम्मीद में हैं, लेकिन वह यह भी मानते हैं कि केवल सरकार विरोधी भावनाओं के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकता। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि 2027 का चुनाव केवल नेताओं का नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं की ऊर्जा और संगठनात्मक प्रबंधन का चुनाव होगा। जिस दल का कार्यकर्ता सबसे अधिक सक्रिय और संतुष्ट होगा, वही चुनावी बढ़त हासिल कर सकता है।

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