देश के पढ़े लिखे युवा बेरोजगार सड़कों पर है। पेपर लीक और सरकार की कार्य प्रणाली तथा सिस्टम की नाकामियों को अपनी बर्बादी का जिम्मेदार मानने वाले यह युवा भले ही अत्यंत आक्रोशित हैं लेकिन वह शांतिपूर्ण और संवैधानिक दायरे में रहकर ही अपनी समस्याओं के समाधान की मांग कर रहे हैं। एक तरफ कॉकरोच जनता पार्टी के संयोजक अभिजीत दिपके अपने ऊपर हुई थप्पड़ों की बरसात के बीच केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग के लिए 5 दिन के अल्टीमेट की समय सीमा निकल जाने के बाद भी धैर्य और संयम के साथ पांचवें दिन भी अपने विरोध प्रदर्शन को जारी रखे हुए हैं तथा पुलिस प्रशासन से भी सहयोग की अपेक्षा कर रहे हैं साथ ही वह अनिश्चितकाल तक मैदान में डटे रहने की घोषणा भी कर चुके हैं। जो अब सत्ता में बैठे लोगों को नाकाबिले बर्दाश्त हो चुका है। उन पर पुलिस प्रशासन सत्ता के इशारे पर जंतर मंतर से हटाने के लिए दबाव बना रहा है लेकिन वह भी आर पार की लकीर खींच चुके हैं। शासन प्रशासन के लिए चुनौती बना यह युवा आक्रोश अब सत्ता के लिए चुनौती बन चुका है। मगर उसे यह भी डर है कि अगर इन युवाओं के खिलाफ बल प्रयोग हुआ तो उसके परिणाम श्रीलंका और नेपाल जैसे जेन जे आंदोलन का रूप लेने में समय नहीं लगेगा। दिपके तो अब सभी युवाओं और उनके अभिभावकों को सहयोग के लिए आगे आने की अपील कर ही रहे हैं साथ ही वह किसानों और नेता विपक्ष राहुल गांधी से भी युवाओं के समर्थन में आगे आने की अपील कर रहे हैं। युवाओं के इस आंदोलन को अराजक बनाने की कोशिशे भी पर्दे के पीछे से चल रही है और सरकार तथा प्रशासन मौके की तलाश में बैठा है कि वह इस आंदोलन का अंत कराये। युवाओं के इस आक्रोश के साथ किसी भी तरह का खेला हुआ तो वह आग से खेलना ही होगा। इन युवाओं का दर्द व पीड़ा को अगर ठीक से समझा जाए तो अब पेपर लीक के कारण दर्जन भर से अधिक युवाओं की आत्महत्याओं और मानसिक तनाव से समझा जा सकता है जो वह सालों से पेपर लीक के कारण झेल रहे हैं। राहुल गांधी ने अभी कोटा में छात्रों के साथ जो संवाद का कार्यक्रम आयोजित किया गया था उसमें उमड़ी युवाओं की भीड़ और राहुल गांधी का इस समस्या की जड़ के बारे में बेबाकी से रखी गई अपनी बात से छात्रों को लगा था कि सिर्फ राहुल गांधी ही उनकी समस्या का समाधान कर सकते हैं। युवा वह चाहे राहुल गांधी के साथ खड़े दिख रहे हो या जंतर मंतर पर अभिजीत दिपके के साथ। इन सभी की समस्याएं अलग—अलग नहीं है। सत्ता में बैठे लोगों के लिए यह युवा आक्रोश इसलिए बेकली का कारण बना हुआ है कि यही युवा अब तक सरकार की सबसे बड़ी ताकत बनकर उसके साथ रहा है उनकी नाराजगी का मतलब भी साफ है अगर सरकार के हाथ से यह युवा वोटर छिटक जाता है तो भाजपा का पत्ता साफ समझो। यही कारण है कि सत्ता इनके साथ वैसा करने में हिचक रही है जैसा वह किसान आंदोलनकारी व अन्य आंदोलनकारियों के साथ करती आई है। हालात कब करवट बदल लेते हैं इसका कुछ भी अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। हो सकता है भाजपा में अब इस्तीफे नहीं होते हैं कहने वाली पार्टी धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा कराकर कॉकरोचों को कभी भी घर भेज सकती है। क्योंकि उनकी मांग सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक ही सीमित है। या फिर पुलिस फोर्स का प्रयोग कर उनके मनोबल को भी चकनाचूर कर सकती है। लेकिन इस खेल में अब सरकार की स्थिति आगे कुआं पीछे खाई वाली ही है। इसका बड़ा नुकसान हर हाल में सरकार को ही होना तय है। क्योंकि उसके पास इसका कोई उचित समाधान ही नहीं है।




