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‘काकरोच’ की ‘डिजिटल फौज’

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  • इंस्टाग्राम पर रेंगते हुए आई काकरोच पार्टी, करोड़ों फालोअर्स, इंटरनेट पर मचा तहलका
  • इंस्टाग्राम पर इसके फालोअर्स ने बीजेपी और कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों को भी पीछे छोड़ा

देहरादून। पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं, तो आपने एक अजीबोगरीब नाम बार-बार ट्रेंड होते देखा होगाकृकाकरोच पार्टी। पहली नजर में यह किसी हालीवुड की एनिमेटेड फिल्म या मीम जैसा लग सकता है, लेकिन डिजिटल गलियारों में इस वक्त यह शब्द एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का केंद्र बन चुका है। इंटरनेट की दुनिया में यह काकरोच तेजी से रेंग रहा है और हर टाइमलाइन पर कब्जा कर चुका है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और यूट्यूब पर लोग मजेदार मीम, कटाक्ष भरे वीडियो और राजनीतिक तंज के जरिए इस शब्द को वायरल कर रहे हैं। पहली नजर में यह केवल इंटरनेट का मजाक लग सकता है, लेकिन इसके पीछे जनता की गहरी नाराजगी और राजनीतिक व्यवस्था से उपजा अविश्वास साफ दिखाई देता है।
दरअसल सोशल मीडिया सर्च से पता चला है कि देश के सीएजेआई की एक टिप्पणी के बाद इंटरनेट पर यह बवाल मचा। बवाल भी इतना कि इसने इंटरनेट के सभी रिकार्ड ध्वस्त कर दिए और देश की प्रमुख पार्टियों भाजपा और कांग्रेस को ही इंटरनेट पर पछाड़ दिया। आज आप जब सोशल मीडिया देख रहे होंगे तो आपके मोबाइल पर भी काकरोच पार्टी रेंग रही होगी। बता दें कि काकरोच पार्टी शब्द का इस्तेमाल लोग उन नेताओं और राजनीतिक प्रवृत्तियों के लिए कर रहे हैं, जो हर परिस्थिति में खुद को बचा लेते हैं। जैसे काकरोच को सबसे जिद्दी और हर हाल में जिंदा रहने वाला जीव माना जाता है, वैसे ही सोशल मीडिया यूजर्स भ्रष्टाचार, दल-बदल और अवसरवाद की राजनीति को इस प्रतीक से जोड़ रहे हैं। युवाओं के बीच यह ट्रेंड तेजी से इसलिए भी फैल रहा है क्योंकि अब राजनीति पर सीधी बहस की जगह व्यंग्य और मीम ने ले ली है। आज का युवा लंबा भाषण नहीं सुनता, बल्कि 30 सेकेंड की रील में पूरा राजनीतिक संदेश समझ लेता है। काकरोच पार्टी उसी डिजिटल राजनीति की उपज है, जहां हास्य के जरिए सत्ता और व्यवस्था पर चोट की जाती है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह ट्रेंड केवल मनोरंजन नहीं है। यह उस पीढ़ी की निराशा को दर्शाता है जो बार-बार भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई और नेताओं के बदलते बयान देखकर राजनीति से दूरी महसूस कर रही है। सोशल मीडिया पर लोग लिख रहे हैं कि पार्टियां बदल जाती हैं, चेहरे बदल जाते हैं, लेकिन व्यवस्था की आदतें नहीं बदलतीं। दिलचस्प बात यह भी है कि इस ट्रेंड में किसी एक दल को निशाना नहीं बनाया जा रहा, बल्कि पूरी राजनीतिक संस्क1ति पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। यही कारण है कि काकरोच पार्टी एक मीम से बढ़कर व्यवस्था विरोधी जनभावना का प्रतीक बनती जा रही है।
हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि सोशल मीडिया की यह व्यंग्य संस्कृति लोकतंत्र के लिए दोधारी तलवार है। एक ओर यह जनता को खुलकर बोलने का मंच देती है, वहीं दूसरी ओर गंभीर मुद्दों को केवल मजाक तक सीमित कर देने का खतरा भी पैदा करती है। फिर भी इतना तय है कि आज की राजनीति में सोशल मीडिया केवल प्रचार का माध्यम नहीं रह गया है। अब जनता भी मीम और ट्रेंड के जरिए नेताओं को आईना दिखा रही है। काकरोच पार्टी का वायरल होना इस बात का संकेत है कि जनता अब नाराजगी को भाषणों में नहीं, बल्कि व्यंग्य में व्यक्त कर रही है।
हालांकि यह देखने में एक मजाकिया मीम या तीखा तंज लगता है, लेकिन भाषा के जानकारों ने इस पर चिंता भी जताई है। राजनीति में जब आप अपने विरोधियों को इंसान न मानकर कीड़े-मकोड़े या काकरोच कहना शुरू कर देते हैं, तो इसे समाजशास्त्र में डीह्यूमनाइजेशन कहा जाता है। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी वर्ग या पार्टी को कीड़े-मकोड़ों की उपमा दी जाती है, तो समाज में नफरत का स्तर बहुत तेजी से बढ़ता है।
फिलहाल सोशल मीडिया पर छाई काकरोच पाटी कोई असली राजनीतिक दल नहीं है, बल्कि यह इस दौर के डिजिटल फ्रस्ट्रेशन और क्रिएटिविटी का एक काकटेल है। देखना दिलचस्प होगा कि यह महज कुछ दिनों का इंटरनेट ट्रेंड बनकर दम तोड़ देता है, या आने वाले समय में मुख्यधारा की राजनीति के नेता भी एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए इस काकरोच शब्द का इस्तेमाल अपने भाषणों में करने लगेंगे।

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