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क्या कहते हैं चुनाव नतीजे?

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देश के पांच राज्यों के चुनावी नतीजे के आने के बाद अब हर जगह इन चुनावी नतीजो की समीक्षा का दौर जारी है। भाजपा ने पश्चिम बंगाल में 15 सालों से सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी और उनकी टीएमसी की सरकार को उखाड़ फेंकने में सफलता हासिल कर ली है वहीं असम और पांडुचेरी में अपनी सरकार बचाए रखकर मोदी है तो मुमकिन है कि नारे को तमाम बाधाओ और विसंगतियों के बावजूद भी सत्य साबित कर दिया है। पश्चिम बंगाल में भी भगवा लहरा कर भाजपा ने यह सिद्ध कर दिया है कि अब किसी भी क्षेत्रीय दल या राष्ट्रीय दल में इतना दम—खम नहीं है जो उसके विजय रथ को रोक सके। दक्षिण भारत के कुछ राज्यों को छोड़कर देश के 23 राज्यों में अपनी सत्ता स्थापित कर चुकी भाजपा ने पश्चिम बंगाल की जीत के साथ एक नया इतिहास रच दिया है। ऐसी स्थिति में उसका जश्न मनाना अति स्वाभाविक है। इन पांच राज्यों के चुनावी नतीजो में जहां पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत एक बड़ी राजनीतिक घटना है तो वहीं दूसरी चौंकाने वाली घटना है तमिलनाडु में अभिनेता विजय थलापति की नई नवेली पार्टी टीबीके का 107 सीटे जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आना। भले ही टीबीके बहुमत से 11 सीटें पीछे रह गई हो लेकिन स्टालिन को पटखनी देने वाले विजय की इस विजय ने यह सत्य पुनर्स्थापित कर दिया है कि दक्षिण की राजनीति में फिल्म स्टारों के युग का अभी अंत नहीं हुआ है इन पांच राज्यों के चुनावी नतीजों में यह बात कहीं भी कोई मायने नहीं रखती है कि किस पार्टी को कहां कितनी सीटें मिली और किसने किस प्रत्याशी को कितने मत्तांतर से हराकर जीत दर्ज की है महत्वपूर्ण बात यह है कि देश के राष्ट्रीय दल और क्षेत्रीय दलों में अब कौन ऐसा दल या पार्टी बची है जो भाजपा का मुकाबला कर सकती है राज्य दर राज्य क्षेत्रीय दलों की वर्चस्व को धराशाही करती हुई भाजपा के सामने क्या कोई क्षेत्रीय छत्रप टिका रह सकेगा? बात चाहे बिहार की हो या महाराष्ट्र की अर्थात उत्तर प्रदेश की हो या पश्चिम बंगाल की। जो पश्चिम बंगाल भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ था उसे फतह करने के बाद अब उत्तर प्रदेश में सपा के सामने भी यह सवाल एक यक्ष प्रश्न बनकर खड़ा हो गया है वही उत्तराखंड में कांग्रेस के लिए भाजपा को जीत की हैट्रिक से रोक पाने की चुनौती और भी गंभीर हो गई है। अगर भाजपा की अब तक की विजय यात्रा पर गौर करें तो इस पार्टी की आर्थिक स्थिति की मजबूती ही उसकी जीत का अहम कारण रही है जिसके दम पर भाजपा ने केंद्रीय सत्ता में आने के बाद मीडिया से लेकर तमाम सरकारी तंत्र और एजेंसियों को अपने अनुरूप बना लिया है तथा देश की आधी आबादी के वोट बैंक को अपने पक्ष में साधने में सफलता हासिल कर ली है भले ही नारी बंधन अधिनियम को लंबे समय तक लटकाए रखा गया हो और पीएम मोदी देश के लोगों को मुफ्त की रेवड़िया बांटने वालों से सावधान रहने की नसीहत दे रहे हो लेकिन चुनावों में महिलाओं के खातों में डायरेक्ट मोटी रकम ट्रांसफर करने का काम भी बखूबी किया जा रहा है अब यही आधी आबादी और उसका वोट भाजपा और मोदी के लिए जीत की गारंटी बन चुका है। भले ही अब भाजपा की सरकार कुछ भी करती रहे और विपक्षी दल कितना भी जोर लगा ले वह भाजपा को नहीं हरा पाएंगे क्योंकि उनके पास मुफ्त की रेवड़ियंा बांटने के लिए धन नहीं है।

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