- पत्थरों की विरासत और लकड़ी पर उकेरे होते थे भगवान
- यह है आस्था, प्रकृति और लोकजीवन का अद्भुत संगम
- आज पहाड़ में कई घरों में लटके हैं ताले और दीवारें ढह रही
- खंडहरों में खोली के गणेश आज भी अपनी जगह पर अडिग
देहरादून। हिमालय की वादियों में जब सर्द हवाएं चलती हैं और धुंध की चादर पुराने गांवों को ढक लेती है, तब भी ऊंचे पहाड़ों पर बने पठाल की छत वाले घरों की चौखटें एक अलग ही चमक बिखेरती हैं। इन घरों के मुख्य द्वार, जिसे पहाड़ी में खोली कहा जाता है, पर विराजे गणेश जी केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि उस घर के सबसे बुजुर्ग सदस्य की तरह पहरेदार होते हैं।
पहाड़ के गांवों में जाने पर गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी का यह मांगल गीत याद आता है-दैणा होया खोली का गणेशा हे…दैणा होया मोरी का नारेणा हे… पहाड़ के उन पुराने घरों को देखकर जिनकी खोलियों में आज भी गणेश जी विराजमान है। आपको बता दें कि पुराने समय में जब पहाड़ में घर बनते थे, तो सबसे पहले स्थानीय शिल्पकार को बुलाया जाता था। वह केवल मिस्त्री नहीं, बल्कि एक कलाकार होता था। टुन या देवदार की सख्त लकड़ी पर जब उसकी छैनी चलती थी, तो वह सबसे पहले चौखट के ठीक बीचों-बीच सिरदल पर एक छोटा सा सिंहासन बनाता था।
उस छोटे से खांचे में भगवान गणेश की आकृति उकेरी जाती थी। हाथ में मोदक, बड़ी सूंड और सौम्य आंखेंकृ गणेश जी का यह स्वरूप विघ्नहर्ता के रूप में घर की दहलीज पर बैठ जाता था। माना जाता था कि जिस घर की खोली में गणेश होंगे, वहाँ दुख और दरिद्रता कभी प्रवेश नहीं कर पाएगी।
यह दर्शाता है कि देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ों में धार्मिक आस्था केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोकजीवन की हर परत में रची-बसी है। गढ़वाल और कुमाऊं के ग्रामीण इलाकों में आज प्रकृति, परिवार और संस्कृति के गहरे संबंध खोली के गणेश के रूप में दिखते हैं। पहले पहाड़ के हर घरों के मुख्य द्वार पर गणेश की आकृति होती थी, लेकिन बदलते परिवेश में यह अब यह कम दिखती है।
पहाड़ी की संस्कृति और स्थापत्य कला में खोली का गणेश मात्र एक मूर्ति नहीं, बल्कि घर की मर्यादा, सुरक्षा और सौभाग्य का प्रतीक है। पहाड़ों के पुराने घरों की नक्काशीदार लकड़ी की चौखट ‘खोली’ के ऊपर विराजमान गणेश जी की यह परंपरा आज भी पहाड़ की पहचान है। पहाड़ी भाषा में खोली का अर्थकृमुख्य द्वार या देहरी होता है। हिंदू धर्म में गणेश जी को विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य माना गया है। शायद यही कारण रहा होगा कि हमारे बुर्जूगों ने इसे सर्वोच्च स्थान दिया होगा।
आज जब हम पहाड़ के वीरान होते गांवों की ओर देखते हैं, तो दिल बैठ जाता है। कई घरों में ताले लटके हैं, दीवारें ढह रही हैं, लेकिन उन खंडहरों की चौखटों पर आज भी वह खोली का गणेश अपनी जगह पर अडिग है। पलायन ने इंसान को तो घर से दूर कर दिया, लेकिन गणेश जी आज भी उसी सूनी देहरी की रक्षा कर रहे हैं। कई लोग अब इन पुरानी चौखटों को उखाड़कर शहरों में ले जा रहे हैं, ताकि आधुनिक कंक्रीट के घरों में अपने पूर्वजों की उस आस्था को फिर से जीवित कर सकें।




