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पीएम हो तो बालेन जैसा

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इन दिनों भारत का एक पड़ोसी देश नेपाल चर्चाओं के केंद्र में है। क्षेत्रफल और आबादी के लिहाज से अत्यंत छोटे से इस देश में यूं तो अभी भी लोकतंत्र है लेकिन जिस युवा नेता के नेतृत्व में नई निर्वाचित सरकार बनाई गई है उसने सत्ता संभालते ही मात्र 48 घंटे में जो परिवर्तनकारी फैसले लिए हैं उन्होंने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है नेपाल के नव निर्वाचित सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह जिन्हें लोग प्यार से बालेन शाह कहते हैं उनके ही नेतृत्व में जेन—जे ने पूर्व पीएम केपी कोली की सरकार को न सिर्फ उखाड़ कर फेंक दिया अपितु नेपाल के युवाओं ने नेपाल के भविष्य की बागडोर उन्हे सौंप कर यह मौका दिया है कि वह कुछ अलग करके दिखाएं। नेपाल के आंदोलन का मुख्य कारण रहे भ्रष्टाचार और दलितों के पिछड़ेपन पर बालेन्द्र सरकार ने दलितों से राष्ट्रीय माफी मांगी है तथा उसे पूरी तरह बदलने तथा भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए 100 सूत्रीय एजेंडे पर अपनी मोहर लगाई है। बालेेन्द्र सरकार ने फैसला किया है कि किसी भी वीआईपी के लिए सड़क पर ट्रैफिक को नहीं रोका जाएगा। सभी मंत्री संत्री और अधिकारी सामान्य लोगों की तरह ही चलेंगे बिना हूटर— शूटर के। बालेन्द्र शाह की सरकार ने सभी नेताओं और अधिकारियों तथा सरकारी कर्मचारियों के अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ना अनिवार्य कर दिया है साफ है कि सरकारी नौकरी करनी है या नेतागिरी करनी है तो बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाओ वरना नौकरी छोड़ो व राजनीति छोड़ो। उनका यह फैसला शिक्षा के लिए युगांतरकारी माना जा रहा है। सरकार ने कॉलेज की राजनीति पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है किसी भी राजनीतिक पार्टी का समर्थन किसी भी छात्र यूनियन को नहीं होगा ठीक वैसे ही कोई सरकारी नौकर किसी भी यूनियन का हिस्सा नहीं बनेगा। नेपाल की नई सरकार द्वारा सभी कोचिंग सेंटरों को बंद करने के आदेश जारी कर दिए गए हैं भ्रष्टाचार पर बड़ा प्रहार करते हुए 1990 से सभी संदिग्ध खातों की जांच एक माह में करने और विदेश में जमा काले धन को वापस लाने का फैसला लिया गया है। नेपाल के विदेश मंत्री ने राजदूतों को एक—एक कर मिलने की प्रथा को समाप्त करते हुए 17 देश के राजदूतों के साथ एक साथ मुलाकात की जो इस बात का संकेत है कि नेपाल की नई सरकार एक बड़े बदलाव की ओर बढ़ चुकी है। पूर्व पीएम केपीएस कोली और गृहमंत्री के भ्रष्टाचार का पूरा हिसाब किताब करने की दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ नई सरकार ने काम शुरू कर दिया है। निजी स्कूलों को बंद करने और छात्र राजनीति पर बैन तथा नौकरशाही को राजनीति मुक्त बनाने के फैसले बड़े फैसले हैं पांचवी तक छात्रों की कोई परीक्षा न करने का फैसला व सरकारी स्कूलों की दिशा व दशा सुधारने का फैसला नेपाल की तस्वीर बदल सकता है। सामाजिक न्याय भी बालेन्द्र सरकार की प्राथमिकता है नेपाल की कुल आबादी के 13 फीसदी दलित व पिछड़े हैं जिसमें 48 फीसदी अत्यंत की गरीब है नई सरकार का मानना है कि समाज में उन्हें बराबरी की हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। भले ही अभी नेपाल की नई सरकार के बड़े फैसले को लेकर आम तौर पर लोग यही कह रहे हैं कि नया मुल्ला अल्लाह ही अल्लाह आने वाले समय में बालेन्द्र और उनकी सरकार भी इसी व्यवस्था में घुल मिल जाएगी लेकिन अगर वह कुछ बड़ा कर पाए जैसा कि उनके फैसले में दिख रहा है तो इसका असर अन्य तमाम देशों में देखा जाना तय है। क्योंकि सत्ता की क्रूरता से तमाम देश परेशान है जिन्हें बालेन्द्र जैसे प्रधानमंत्री की जरूरत है।

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