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देश व समाज से ऊपर राजनीति

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जब सत्ता देश और समाज से ऊपर हो जाए तथा मुख्य धारा का मीडिया उसका गुलाम हो जाए तब ऐसी स्थिति में न तो कोई संवैधानिक संस्था मायने रखती है और न वह न्यायपालिका जिसे लोकतंत्र में सर्वाेच्च माना जाता है। देश की राजनीति बीते कुछ सालों से जिस दिशा में जा रही है उसके सैकड़ो प्रमाण ऐसे हैं जो इस बात की तस्दीक करते हैं कि देश का लोकतंत्र और वह संविधान जिसके नियम कानूनों के तहत देश का राजकाज संचालित होता था अब उसके कोई मायने नहीं रह गए हैं। सिर्फ सत्ता बल ही सर्वाेच्च है अब, उसके सामने कोई राष्ट्र हित है न समाज हित है। बीते समय में हमने चंडीगढ़ के मेयर पद के चुनाव में धांधली के प्रत्यक्ष प्रमाण देखे थे जिसके परिणाम को न्यायालय ने असवैधानिक करार देते हुए पलट दिया था। लेकिन वह बात अब बीते समय की बात हो चुकी है। शायद भविष्य में आप ऐसा कोई फैसला न देख पाए। आजकल सिर्फ सोशल मीडिया पर राज्यसभा चुनाव में विधायकों की खरीद फरोख्त की वायरल वीडियो आप देख सकते हैं। जिसमें 10 और 20 करोड़ तक में एक विधायक की खरीद फरोख्त हो रही है। हरियाणा के पांच विधायकों ने क्रॉस वोटिंग और चार विधायकों ने अपने वोट रद्द करा कर भाजपा प्रत्याशियों को जीत दिला दी गई। देश में विपक्षी दलों के नेताओं का सत्ताधारी दल के साथ जाने का सिलसिला अविराम जारी है। यह नेता यूं ही नहीं सत्ताधारी दल के साथ जा रहे हैं इनमें से कुछ को उनके काले कारनामों के कारण जेल जाने का भय है। तो कुछ को धन का लालच देकर अपने साथ खड़ा किया जा रहा है। चुनाव जीतने के लिए साम दाम, दंड, भेद की तमाम नीतियों को अपनाया जा रहा है तथा संवैधानिक संस्थाओं के नियम कानूनाें में बड़े बदलाव कर सत्ता पक्ष में काम करने पर कैसे विवश किया जा रहा है इसका उदाहरण निर्वाचन आयुक्तों के चुनावों में किये बदलाव से अच्छा कोई अन्य उदाहरण क्या होगा। विपक्ष के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए सर से पैर तक भ्रष्टाचार में डूबे ब्यूरोक्रेट्स का कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है इसका उदाहरण है 204 अधिकारियों के वह खत जो सिर्फ राहुल गांधी के चाय पीने व बिस्किट खाने को लेकर लिखे गए हैं क्योंकि उन्होंने संसद भवन की सीढ़ियों पर बैठकर ऐसा किया इन सेवानिवृत अधिकारियों को इस शर्मनाक काम करने के लिए देश से माफी मांगने की बात की जा रही है। देश में चुनावी धांधली को लेकर एक तरफ महासंग्राम छिडा़ है तो दूसरी ओर मीडिया की भूमिका सवालों के घेरे में है। बीते दिनों एक टीवी चैनल पर चर्चा में किसी ने कहा कि देश की जनता की कमी के कारण भाजपा को तीसरी बार सत्ता में आने का मौका नहीं मिला है बल्कि नीतीश और नायडू जैसे सत्ता स्वार्थी नेताओं के कारण आज भाजपा सत्ता पर काबिज है। अब सोशल मीडिया पर तो इनकी भी इंडियन स्टीन फाइल की बात कही जा रही है लेकिन हम इसकी पुष्टि नहीं कर सकते हैं। कुल मिलाकर देश और समाज के सामने लोकतंत्र और संविधान बचाने की लड़ाई का एक ऐसा एपिसोड चल रहा है जहां सब कुछ स्याह ही स्याह दिखाई दे रहा है। वैश्विक स्तर पर एक और विश्व युद्ध की दस्तक के बीच देश की राजनीति और समाज दोनों ही जिस तरह से चक्रव्यूह में फंसे हुए हैं उससे बाहर कैसे आया जा सकता है इस सवाल का जवाब किसी के पास फिलहाल तो नहीं है।

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