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विवश व डरी हुई सरकार

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भले ही संसद के वर्तमान शीतकालीन सत्र में देश और समाज की किसी ज्वलंत समस्या पर कोई सार्थक चर्चा या चिंतन मंथन न हुआ हो लेकिन इस सत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि यह जरूर रही है कि पक्ष और विपक्ष के सांसदों के अभिभाषणों से देश की जनता के सामने वर्तमान की राजनीति की दिशा और दशा की एक स्पष्ट तस्वीर जरूर साफ हो गई है। 10 सालों से जिस विपक्ष की आवाज तक न सुनने के आदि हो चुके वह भाजपा के नेता और स्पीकर को विपक्ष के नेताओं ने न वह सुनने पर मजबूर कर दिया गया बल्कि उन्होंने वह सब कुछ सुनाने में भी कोई कमी नहीं उठा कर रखी जो सुनाया जाना जरूरी हो गया था। खास बात यह रही कि सत्ता पक्ष के पास सर झुका कर सुनने के सिवाय कोई विकल्प तो था ही नहीं विपक्षी नेताओं के सवालों का जवाब देने के लिए भी कुछ नहीं था। देश के स्वतंत्रता के इतिहास में इस तरह की लचर सरकार शायद इससे पहले कभी किसी ने भी नहीं देखी होगी। शीतकालीन सत्र की तमाम वीडियो क्लिपिंग भले ही सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हो और इन पर अनेक मीन्स भी देखे जा सकते हैं। जिनके माध्यम से यह देखा समझा जा सकता है कि देश की राजनीति का क्या हाल—चाल है और इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है। वंदे मातरम जैसे मुद्दों पर संसद में बहस कराने वाली भाजपा और उसके नेताओं को विपक्ष के सांसदों द्वारा जिस तरह से अपने तर्कों और तथ्यों की रोशनी में आईना दिखाया गया उसके सच के सामने उनकी राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रवाद की इमारत चंद मिनटों में ही ताश के पत्तों की तरह भरभरा कर ढह गई। आप का नेता संजय सिंह जब भाजपा नेताओं को संसद में चुनौती दे रहे थे कि वह अपने पुरखों के सिर्फ चार के नाम बता दे जिन्होंने आजादी के आंदोलन में कोई कुर्बानी दी हो मैं आप के उन जयचंदों के नाम और अंग्रेजों के लिए मुखबरी करने वालों का इतिहास बता देता हूं। अकेले संजय सिंह ही नहीं अखिलेश यादव से लेकर प्रियंका गांधी तक किसी के भी भाषणों को उठाकर देख लीजिए की विपक्ष के किसी भी सवाल का जवाब सत्ता पक्ष ने दिया हो। प्रियंका गांधी का वह भाषण जो वायरल हुआ जिसमें वह पीएम मोदी को एक सलाह देते हुए कहती है कि प्रधानमंत्री भाषण तो बहुत अच्छा करते हैं लेकिन तथ्यों के मामले में थोड़ा कमजोर पड़ जाते हैं वह उनके इतिहास के ज्ञान को सुधारते है वह भी तथ्यों के साथ। साथ—साथ उन्हें एक सलाह देने की बात करते हुए पीएम मोदी को चुनौती दे डालते हैं कि वह नेहरू और इंदिरा तथा राजीव गांधी की खामियों की सूची बना ले और एक दिन संसद में इस पर 10—20 या 40 घंटे की चर्चा कर लेते हैं देश के लोगों को भी पता चल जाएगा कि उन्होंने क्या गलत किया परिवारवाद क्या है वह यही नहीं रुकी वह कहती रही हर रोज संसद का समय बर्बाद तो नहीं होगा। फिर हम महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के साथ उस पर भी चर्चा कर लेंगे जो आजकल पीएमओ में क्या क्या हो रहा है निसंदेह पीएम बनने के बाद मोदी ने इतने तल्ख सवालों का सामना कभी नहीं किया होगा न ही अमित शाह को किसी ने वैसे खुली बहस की चुनौती दी होगी जैसी चुनौती राहुल गांधी ने देश में चल रहे वोट चोरी और एसआईआर की दी गई। देश के इन नेताओं ने शायद ऐसी स्थितियों की कल्पना भी नहीं की होगी कि भरी संसद में कोई कहेगा कि आप सिर्फ चुनाव के लिए ही बने हैं और हम देश के लिए। कहा जाता है कि आईना कभी झूठ नहीं बोलता है विपक्ष ने इस सत्ता पक्ष के नेताओं को सच का ऐसा आईना दिखाया है कि इस आईने में अपनी खुद की शक्ल देखकर उन्हें खुद से डर लगने लगा है। उन्हें अब इस बात पर हैरानी जरूर हो रही होगी कि क्या यह वही विपक्ष है जिसे हम खत्म करने का दावा किया करते थे और इसके बारे में रहते थे कि 2024 के चुनाव के बाद विपक्ष दर्शक दीर्घा में बैठा नजर आएगा। विपक्ष को डराने वाले नेता अब अपने भविष्य को लेकर अभी से डरे हुए हैं तो यह शीतकालीन सत्र की बड़ी उपलब्धि है।

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