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गैरसैंण की राजनीतिक नौटंकी

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गैरसैंण मे आयोजित चार दिवसीय मानसून सत्र जिस तरह महज डेढ़ दिन में ही निपटा दिया गया और इस सत्र के दौरान प्रश्न काल के समय एक भी सवाल का जवाब नहीं हुआ, ऐसे में अगर राज्य के लोग इसे सरकार की नौटंकी बता रहे हैं तो इसमें गलत ही क्या है। हालांकि ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है। अब तक गैरसैंण में आयोजित होने वाले अधिकांश विधानसभा सत्र निर्धारित समयावधि से पूर्व ही निपटाये जाते रहे हैं जो इस बात का सबूत है कि गैरसैंण को लेकर हमारे माननीय कतई भी गंभीर नहीं रहे हैं। लेकिन जैसा इस बार देखने को मिला है वह कुछ अलग तरह का है। क्योंकि इस पूरे मानसून सत्र में सिर्फ एक डेढ़ घंटे चली कार्यवाही भी महज औपचारिकता भर ही रही न कोई प्रश्न काल न कोई शुन्य काल सिर्फ अनुपूरक बजट और कुछ विधेयकों को पेश किए जाने और बिना किसी चर्चा के पास मान लिए जाने की औपचारिकता भर ही इसकी उपलब्धि रही। प्रदेश की जनता को उम्मीद थी कि इस सत्र में उनके विधायकों द्वारा उन तमाम मुद्दों को गंभीरता से उठाया जाएगा जिनसे इस मानसूनी आपदा में लोग जूझ रहे है उन्हें सरकार से उम्मीद थी कि उनकी समस्या का कोई समाधान सरकार द्वारा निकाला जाएगा। उत्तराखंड सरकार के बारे में गैरसैंण के विधानसभा सत्र को लेकर यही कहा जाता रहा है कि यहां मंत्री और विधायक सरकारी खर्च पर सैर सपाटे पर आते हैं और चले जाते हैं। हर एक सत्र के आयोजन पर हर बार जनता की गाड़ी कमाई के करोड़ों रुपए पानी में बहा दिए जाते हैं और बस कहने भर को यह हो जाता है कि हमने गैरसैंण में तब तब सत्रों का आयोजन किया था। मुख्यमंत्री धामी कहते हैं कि विपक्ष ने पंचायत चुनाव की अपनी निराशा और कुंठा के कारण सत्र को नहीं चलने दिया वह यही नहीं रुकते बल्कि सदन में सोने वाले विधायकों को यह नसीहत भी देते हैं कि उन्हें आपदा प्रभावितो के बीच जाकर सोना चाहिए। सवाल यह है कि वह तथा उनके कितने मंत्री धराली और हर्षिल तक पहुंचे तथा कितने दिन उनके साथ सोए जबकि उनके पास तो आने जाने के संसाधनों की भी कोई कमी नहीं थी। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा और गणेश गोदियाल ने जरूर इन आपदा प्रभावितों के बीच जाकर उनके साथ समय गुजारा और उन्हें ढांढस भी बंधाया। जिनकी खबरें अखबारों में छपी। प्रदेश की कानून व्यवस्था जिसकी बदहाली की बात अब किसी से भी छिपी नहीं है इस मुद्दे पर अगर सदन में चर्चा की मांग की जा रही थी तो सरकार इस मुद्दे पर विपक्ष को क्यों नहीं सुनना चाहती थी? कांग्रेस नेताओं के सवाल क्या इतने अधिक तीखे थे कि सरकार उनका सामना करने से बच रही थी। सदन से बाहर जब भाजपा के नेता हंगामे का जवाब हंगामे से देते दिखे तो उन्हें सदन में विपक्ष को जवाब देने में क्या परेशानी थी? समझ से परे है। शीतकाल में जब सत्र होता है गैरसैंण में इन मानवीयों को सर्दी सताती है और वह सिर्फ हाजिरी भर लगाकर चले आते हैं। मानसून काल में अगर पहुंच भी जाएं तो चर्चा को तैयार नहीं होते। सत्र का समय ऐसा रखा जाता है कि सीएम के जवाबदेही के लिए सदन में मौजूदगी वाला सोमवार का दिन कभी होता ही नहीं है। तब क्या सत्र सिर्फ विधायी कामकाज के लिए ही बुलाया जाता है।

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