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राज्य की समस्याएं जस की तस

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उत्तराखंड राज्य को बने हुए 25 साल का समय हो चुका हैं। इन 25 सालों में राज्य की मूलभूत समस्याओं का कितना समाधान हो सका है यह सवाल आज भी जस का तस बना हुआ है। राज्य से होने वाला पलायन रोकने के लिए सरकार द्वारा पलायन आयोग तो बनाया गया लेकिन पलायन की स्थिति में अब तक रत्ती भर सुधार नहीं हो सका है। खाली होते गांव इसकी सच्चाई बयां कर रहे हैं। बात अगर राज्य की शिक्षा क्षेत्र की करें तो राज्य के सरकारी स्कूलों में लटकते ताले यह बताने के लिए काफी है कि 25 सालों में उनकी स्थिति और भी अधिक खराब हो चुकी है। राज्य में हजारों स्कूल ऐसे हैं जहां गिनती के 2—4—6 छात्र ही है वही ऐसे स्कूलों की संख्या भी कम नहीं है जहां यह स्कूल एकल शिक्षक के भरोसे ही चल रहे हैं अगर गुरुजी आ गए तो स्कूल खुल गया और अगर नहीं आए तो स्कूल की छुटृी। राज्य बनने के बाद राज्य के स्कूलों में शिक्षकों की फर्जी भर्तियों के समाचारों को लेकर तमाम तरह की अनियमितताएं समय—समय पर सामने आती रही है। फर्जी कागजात से शिक्षक बनने और बिना स्कूल जाए हाजिरी रजिस्टर भरकर वेतन लेने वाले शिक्षकों से भला क्या उम्मीद की जा सकती है कि वह राज्य में बच्चों की शिक्षा की बेहतर नर्सरी तैयार कर सकते हैं। राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं में कितना सुधार इन 25 सालों में उत्तराखंड की सरकारों द्वारा किया जा सका है इसका सच भी किसी से छुपा नहीं है भले ही केंद्र सरकार द्वारा यहां कई मेडिकल कॉलेज तथा एम्स तक बनवा दिए गए हो लेकिन जिला अस्पतालों में अभी तक न विशेषज्ञ डॉक्टर है और न दवाएं और संसाधन है। एयर एंबुलेंस से लैस हो चुके इस राज्य में अभी भी आए दिन गंभीर रूप से बीमार व गर्भवती महिलाओं को लोग डोलियों से कई कई किलोमीटर ढोकर ले जाते हैं, जिसकी तस्वीर अखबारों में आती रहती हैं। अभी बीते दिनों अल्मोड़ा में एक बस खाई में गिर गई जिसमें घायल लोगों को नजदीकी अस्पताल ले जाया गया जहां इलाज करने के लिए न डॉक्टर मिले न दवाएं, और तो और इन घायलों का प्राथमिक इलाज भी मोबाइल की रोशनी में करना पड़ा था। इन्हें दूसरे अस्पताल रेफर करना पड़ा जिसके कारण कई लोगों ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया 25 सालों से राज्य में निरंतर एक से बढ़कर एक घपले—घोटाले हो रहे हैं। इन घोटालों की फेरिश्त इतनी लंबी हो चुकी है कि इन्हें गिना पाना भी संभव नहीं है कोई क्षेत्र और विभाग इससे अछूता नहीं है। गरीबों को मिलने वाले राशन से लेकर भर्तियों और जमीनों के बड़े—बड़े तमाम घोटालों के सामने आने के बाद भी राज्य में अभी तक एक अद्द लोकायुक्त का गठन नहीं किया जा सका है। जबकि इसके लिए एक दशक से कवायत जारी है। उत्तराखंड में कभी लोकायुक्त गठन हो पाएगा हाईकोर्ट के जवाब—तलब के बाद भी नतीजा शुन्य है। सूबे के माननीय राज्य की किसी भी गंभीर समस्या को लेकर गंभीर नहीं है उनके लिए अभी भी देसी—पहाड़ी और गढ़वाली—कुमाऊनी तथा हिंदू—मुस्लिम के मुद्दे ही सबसे अधिक जरूरी बन चुके हैं। जाति—धर्म व क्षेत्रवाद की राजनीति ही उनके लिए राजनीति का मकसद बन चुका है और अगर इससे आगे भी जरूरत पड़े तो राजधानी गैरसैंण का मुद्दा भी उनकी प्राथमिकता हो जाता है। 25 सालों में अब तक की सरकारों ने जैसा काम किया है वैसे ही नतीजा भी सामने हैं।

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