May 16, 202671 हजार का ऋण माफ, 50 हजार की आर्थिक सहायता देहरादून। जिला प्रशासन ने कैंसर पीडित परिवार को राहत देते हुए 71 हजार का ऋण माफ कर 50 हजार की आर्थिक सहायता भी प्रदान की।आज यहां मुख्यमंत्री के निर्देशों को धरातल पर उतारते हुए जिला प्रशासन देहरादून लगातार मानवीय संवेदनशीलता एवं त्वरित कार्रवाई के साथ जरूरतमंद परिवारों को राहत पहुंचाने का कार्य कर रहा है। जिलाधिकारी सविन बंसल के नेतृत्व में जिला प्रशासन द्वारा विभिन्न जिला स्तरीय प्रोजेक्ट, सीएसआर फंड, रायफल क्लब मद तथा अन्य उपलब्ध संसाधनों के माध्यम से अनेक असहाय एवं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को सहायता प्रदान की जा रही है। मुख्यमंत्री के स्पष्ट निर्देश हैं कि जनमानस की समस्याओं के समाधान में किसी भी स्तर पर संवेदनहीनता अथवा योजनाओं के लाभ से वंचित होने जैसी स्थिति नहीं आनी चाहिए। यदि किसी जरूरतमंद, असहाय अथवा पात्र व्यक्ति तक शासन की योजनाओं का लाभ पहुंचने में किसी प्रकार का गैप रह जाता है, तो जिला प्रशासन अपने स्तर पर उस कमी को पूरा करते हुए तत्काल सहायता उपलब्ध कराए। जनसामान्य की समस्याओं के त्वरित एवं संवेदनशील समाधान हेतु प्रतिबद्ध जिला प्रशासन ने एक बार फिर मानवीय संवेदनशीलता का परिचय देते हुए आर्थिक संकट से जूझ रहे एक कैंसर पीड़ित परिवार को बड़ी राहत प्रदान की है। इसी क्रम में हाल ही में रायपुर क्षेत्र की एक महिला, जिनके पति कैंसर से पीड़ित हैं और परिवार गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा था, को जिला प्रशासन द्वारा बड़ी राहत प्रदान की गई। परिवार पर लगभग 71 हजार रुपये का ऋण बकाया था तथा लगातार इलाज एवं घरेलू खर्चों के कारण परिवार दयनीय स्थिति में पहुंच चुका था। मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन ने सीएसआर फंड से ऋण की सम्पूर्ण धनराशि जमा कराते हुए संबंधित परिवार को ऋणमुक्त कराया। साथ ही अतिरिक्त आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई गई। रायपुर विकासखण्ड के दूरस्थ ग्राम द्वारा मालदेवता निवासी संध्या रमोला ने जिलाधिकारी सविन बंसल के समक्ष प्रस्तुत होकर प्रार्थना पत्र के माध्यम से अपनी पीड़ा व्यक्त की। उन्होंने बताया कि उनके पति गले के कैंसर से पीड़ित हैं तथा उनका उपचार हिमालय अस्पताल में चल रहा है। गंभीर बीमारी और लगातार कीमोथेरेपी के चलते उनके पति कार्य करने में असमर्थ हो गए हैं, जबकि परिवार के भरण—पोषण की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं पर निर्भर थी। संध्या ने अवगत कराया कि उनके दो छोटे बच्चे हैं, जिनमें एक की आयु लगभग तीन वर्ष तथा दूसरे की छह वर्ष है। लगातार इलाज, दवाइयों एवं घरेलू खर्चों के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत दयनीय हो चुकी है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2024 में 45 हजार रुपये तथा वर्ष 2025 में 37 हजार रुपये का ऋण स्वयं सहायता समूह संचालन एवं स्वरोजगार हेतु बैंक से लिया गया था, किंतु पति की बीमारी के चलते वह ऋण की किश्तें जमा नहीं कर पाईं। परिणामस्वरूप बैंक द्वारा लगभग 71 हजार रुपये जमा करने का नोटिस जारी किया गया तथा एजेंटों द्वारा लगातार दबाव बनाए जाने से परिवार मानसिक तनाव से भी गुजर रहा था। इसी के चलते उन्होंने जिलाधिकारी से ऋण माफी एवं आर्थिक सहायता की गुहार लगाई। जिलाधिकारी सविन बंसल ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए जिला प्रशासन के सीएसआर फंड से 71 हजार रुपये की धनराशि सीधे ऋण खाते में जमा कराने के निर्देश दिए। साथ ही संबंधित बैंक को नो ड्यूज प्रमाण पत्र जारी करने के निर्देश भी दिए गए। इसके अतिरिक्त रायफल क्लब मद से संध्या रमोला के बैंक खाते में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) के माध्यम से 50 हजार रुपये की अतिरिक्त आर्थिक सहायता भी उपलब्ध कराई गई। जिलाधिकारी सविन बंसल ने कहा कि मुख्यमंत्री की मंशा के अनुरूप जनसमस्याओं का समाधान सर्वाेच्च प्राथमिकता है। ऐसे परिवार जो किसी कारणवश योजनाओं के लाभ से वंचित रह जाते हैं अथवा आकस्मिक संकट का सामना कर रहे हैं, उन्हें जिला प्रशासन हरसंभव सहायता उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। जिला प्रशासन द्वारा समय—समय पर दिव्यांगजन, गंभीर बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों, निराश्रित महिलाओं, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों तथा आपात परिस्थितियों से प्रभावित नागरिकों को विभिन्न माध्यमों से सहायता प्रदान की जा रही है। प्रशासन की यह पहल शासन की जनकल्याणकारी सोच, संवेदनशील प्रशासनिक कार्यश्ौली एवं सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रभावी उदाहरण बनकर सामने आ रही है।
May 16, 2026एक-दूसरे के खेतों में बिना मजदूरी के मिलकर करते थे सभी लोग कामरोपाई व कटाई में गूंजते थे लोकगीत, मजबूत होता था सामाजिक रिश्ता पलायन व बदलती जीवनशैली में खत्म हो गई है पहाड़ की पुरानी परंपरा देहरादून। पहाड़ में जेठ की तपती दोपहरी हो या सावन की रिमझिम फुहार यहाँ के सीढ़ीदार खेत अकेले आदमी के बस की बात नहीं होते। जब पहाड़ की ऊबड़-खाबड़ ढलानों पर खेती की बात आती है तो यहा कि एक सदियों पुरानी प्रथा पड़्याल जो सामूहिक श्रम, लोक संस्कृति, समानता, पारंपरिक व्यंजन, सामाजिक मजबूती की मिशाल थी। आज के दौर में यह अब एक दिवास्वप्न बन गई है।कुछ दिनों पहले पहाड़ की यात्रा पर था। खेतों में पानी और तपती दोपहर में खेतों में रौपाई करती कुछ महिलाएं दिखी। लंबे समय बाद पहाड़ जाना हुआ तो मैं भी उन खेतों में चला गया। खेतों में कार्य करती महिलाओं से सवाल-जवाब में पड्याल पर चर्चा की। तो उन्होंने पड़्याल का सरल अर्थ सामूहिक श्रमदान बताया और कहा कि आज यह सब कहां है। पहले जब गांव के किसी एक व्यक्ति के खेत में बुवाई, निराई या कटाई का बड़ा काम होता था, तो पूरा गांव अपनी कुदाल और दराती लेकर उसके खेत में उतर आता है। बदले में कोई पैसा नहीं लिया जाता, बल्कि एक अटूट विश्वास होता है कि आज हम तुम्हारे खेत में हैं, कल तुम हमारे साथ होगे।महिलाओं ने बताया कि पड़्याल केवल श्रमदान नहीं, बल्कि पहाड़ी समाज की आत्मा थी। जब किसी परिवार के खेतों में रोपाई, गुड़ाई या कटाई का समय आता, तो गांव के लोग बिना किसी मजदूरी के मदद के लिए पहुंच जाते। बदले में वह परिवार भी दूसरे के खेतों में उसी तरह काम करता। इस परंपरा में न कोई हिसाब था और न कोई सौदा, केवल अपनापन और सहयोग था। रोपाई के दिनों में खेतों से आती महिलाओं की सामूहिक लोकगीतों की आवाजें पूरे गांव को जीवंत कर देती थीं। खेत काम का स्थान कम और मेल-मिलाप का केंद्र ज्यादा लगते थे। कोई पानी पिलाता, कोई बैलों को संभालता और कोई गीत गाते हुए थकान मिटाता। पहाड़ का कठिन जीवन इसी सामूहिक सहयोग से आसान बनता था।बरसात के दिनों में रोपाई के समय खेतों में महिलाओं के लोकगीत गूंजते थे। पुरुष बैलों और हल के साथ खेत तैयार करते, जबकि महिलाएं कतार में धान रोपती थीं। खेतों में काम के साथ हंसी-मजाक और लोकसंस्कृति भी जीवित रहती थी। उत्तराखंड के पहाड़ों में प्रचलित पड़्याल प्रथा इसी एकजुटता का प्रतीक थी। लेकिन बदलते समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे कमजोर पड़ गई है।आज के दौर में गांवों से पलायन बढ़ गया है और खेती बंजर होने लगी और आपसी मेलजोल की जगह भागदौड़ वाली जिंदगी ने ले ली। अब खेतों में जहां महिलाएं कार्य करती दिखती हैं वहां सामूहिक गीतों की आवाज कम और सन्नाटा ज्यादा सुनाई देता है। क्योंकि सभी महिलाओं ने अपने-अपने कानों पर मोबाइल की लीड लगाकर चुनके से गीतों का अपने आप आनंद लेती दिखती है। यही कारण है कि आज जब समाज में अकेलापन बढ़ रहा है।महिलाएं बताती है कि जब पड़्याल जैसी परंपराएं थी उस समय लोगों में आपसी मेल-मिलाप, हसी-ठिठोली और पहाड़ का जीवन जीवंत था, लेकिन आज सब बदल गया है। पहले पहाड़ केवल प्राकृतिक सुंदरता का नाम नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन और आपसी सहयोग की संस्कृति का भी प्रतीक थे और पड्याल परंपरा केवल खेतों में काम करने की व्यवस्था नहीं थी, बल्कि इंसानियत और सामाजिक एकता की मिसाल थी, लेकिन आज वह सब कहा।
May 15, 2026देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने केन्द्र सरकार की भांति, 1 जनवरी, 2026 से राज्य सरकार के कार्मिकों एवं पेंशनरों को मंहगाई भत्ते की मौजूदा दर 58 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत प्रतिमाह किए जाने का अनुमोदन प्रदान किया है।मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा जनपद चम्पावत के कोतवाली पंचेश्वर में टाईप द्वितीय के 06 आवासों एवं चाहरदीवारी के निर्माण हेतु ₹ 3.13 करोड़, जनपद नैनीताल के फायर स्टेशन हल्द्वानी में टाईप द्वितीय के 64, टाईप-तृतीय के 08 एवं टाईप चतुर्थ के 04 आवासों के निर्माण हेतु ₹ 36.64 करोड तथा जनपद चम्पावत के थाना रीठासाहिब में टाईप द्वितीय के 06 एवं टाईप-तृतीय का 01 आवासों के निर्माण हेतु ₹ 3.47 करोड की धनराशि स्वीकृत किये जाने का अनुमोदन प्रदान किया गया है। मुख्यमंत्री द्वारा मौलेखाल बाजार, अल्मोड़ा में पार्किंग के निर्माण हेतु ₹ 5.91 करोड तथा जनपद चमोली के विधानसभा क्षेत्र-थराली के अर्न्तगत ग्वालदम बाजार में वाहन पार्किंग निर्माण हेतु ₹ 61.57 लाख की धनराशि स्वीकृत किये जाने का अनुमोदन प्रदान किया गया है।
May 15, 2026देहरादून। शासन से प्राप्त निर्देशों के क्रम में ऊर्जा संरक्षण और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देने हेतु महानिदेशक सूचना बंशीधर तिवारी ने सूचना विभाग में प्रत्येक शनिवार को “नो व्हीकल डे” के रूप में मनाने के निर्देश जारी किए हैं।महानिदेशक सूचना ने विभागीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों से अपील की है कि प्रत्येक शनिवार को कार्यालय आने-जाने के लिए सार्वजनिक परिवहन, साइकिल जैसे विकल्पों को अपनाएं। उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे प्रयास सामूहिक रूप से बड़े सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं और यह पहल ऊर्जा संरक्षण के राष्ट्रीय अभियान को मजबूती प्रदान करेगी।उन्होंने यह भी कहा कि विभाग स्वयं इस पहल को अपनाकर समाज के सामने एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करेगा। “नो व्हीकल डे” के माध्यम से न केवल ईंधन की बचत होगी, बल्कि कार्बन उत्सर्जन में कमी लाकर पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान सुनिश्चित किया जा सकेगा।
May 15, 2026देशभर में पीएम की अपील के बाद मची सादगी की होड़ माननीय व अफसरों का आमजन जैसा दिखने का नया दौर सोशल मीडिया में समाज में अचानक उपज गई नई लहर जनता पूछ रहीकृक्या यह असली बचत है या ‘फोटो सेशन’ देहरादून। वैश्विक आर्थिक संकट, बढ़ती महंगाई और अनिश्चितताओं के दौर में प्रधानमंत्री मोदी की सादगी और बचत संबंधी अपील के बाद देश की राजनीति में एक नया दृश्य देखने को मिल रहा है। जैसे ही टीवी पर प्रधानमंत्री ने वैश्विक संकट और मितव्ययिता का आह्वान किया तो सोशल मीडिया पर आर्थिक आपातकाल जैसे हालात हो गए है। माननीय से लेकर छोटे-बडे़ नेता और अधिकारियों को अपनी सादगी और मितव्ययिता का डिजिटल पर प्रदर्शन कर देश में एक अनोखा ट्रेड शुरू हो गया है।अचानक कई माननीयों को सादगी पसंद आने लगी है, जो नेता कल तक बड़े काफिलों और आलीशान व्यवस्थाओं के बीच दिखाई देते थे, वह अब कैमरों के सामने आम आदमी की तरह नजर आने की कोशिश कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरों की बाढ़ आ गई है। ऐसा लगने लगा है मानो देश में अचानक सादगी की प्रतियोगिता शुरू हो गई हो। हालांकि जनता भी अब राजनीति की इस पटकथा को समझने लगी है। लोग पूछ रहे हैं कि यदि सादगी सच में अपनानी है, तो क्या केवल कैमरों के सामने क्यों! क्या सरकारी फिजूलखर्ची, बड़े-बड़े काफिले, वीआईपी संस्कृति पर भी उतनी ही गंभीरता दिखाई जाएगी?प्रधानमंत्री मोदी की अपील के बाद देशभर में नेताओं-अधिकारियों की जीवनशैली में अचानक बदलाव दिखाई देने लगा है। हर कोई पैदल आफिस जाने और अपना काफिला कम करने की फोटो मीडिया और सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर पोस्ट करवा रहा है। भाई पीएम की अपील है और उस पर अमल न हो यह तो हो ही नहीं सकता है। क्योंकि यह तो स्टेसस का सवाल जो है।अकेले उत्तराखंड की बात करें तो यहां तो प्रिंट मीडिया में सायं को जब खबरों का पोस्टमार्टम होता है उस समय माननीय और अधिकारियों की सिफारिशें कि फला-फला… और संपादक जी से लेकर यूनिट हैड तक की सिफारिश आ रही है। यही नहीं सोशल मीडिया के सभी प्लेफार्मों पर तस्वीरों के साथ कई वीडियों माननीय और अफसरों की तैर रही है। आमजन यह देखकर हैरान है कि आखिर एकदम से ऐसा कैसे हो गया। जबकि आमजन तो सदियों से सादगी से जी रहा है।राजनीतिक जानकारों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति में जनसंपर्क और प्रतीकात्मक संदेशों की हमेशा बड़ी भूमिका रही है। स्वच्छता अभियान में झाड़ू लगाना हो या सैनिकों के बीच त्योहार मनानाकृइन संदेशों ने आम जनता पर प्रभाव डाला। अब उसी शैली को दूसरे जनप्रतिनिधि भी अपनाने की कोशिश कर रहे हैं। अधिकारियों के लिए तो यह मजबूरी बन जाती है। आमजन की इस पर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कुछ लोग नेताओं अधिकारियों के इस बदले व्यवहार को सकारात्मक मान रहे हैं, जबकि कई लोगों का कहना है कि दिखावा है और कुछ नहीं।
May 15, 2026देहरादून। राजधानी देहरादून में नालोे—खालों पर लगातार हो रहे अतिक्रमण को लेकर नगर निगम की भूमिका पर सवाल उठने लगे है। ताजा मामला कालीदास रोड स्थित नाले पर की गयी कब्जेदारी को लेकर सामने आया है। हालांकि नगर निगम प्रशासन ने क्षेत्रीय पार्षद की उच्च स्तरीय शिकायत के बाद इस नाले पर किये गये अतिक्रमण को हटा दिया गया है। वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि जब यह अतिक्रमण किया जा रहा था तो नगर निगम प्रशासन शिकायत के बाद भी गहन निद्रा में सोया पड़ा था।आरोप है कि बिल्डर ने विभागों को गुमराह कर खनन अनुमति हासिल की। और निकाली गयी मिट्टी को प्लाट के पीछे स्थित नाले में डाल दिया गया जो बिन्दाल नदी से जुड़ा है। बताया जा रहा है कि नाला पाट देने के बाद वहंा निर्माण गतिविधियंा शुरू कर दी गयी।मामले की गम्भीता को देखते हुए क्षेत्रीय पार्षद मोहन बहुगुणा द्वारा इस मामले को लेकर जहंा नगर निगम में इसकी शिकायत की गयी, जहंा कोई कार्यवाही न होता देख उन्होने मामले से जिलाधिकारी कार्यालय को अवगत कराया गया। जिसके बाद त्वरित कार्यवाही करते हुए नगर निगम प्रशासन द्वारा उक्त अतिक्रमण को खाली करा दिया गया है। सवाल यह है कि अगर स्थानीय लोग व क्षेत्रीय पार्षद मोहन बहुगुणा इस मामले को लेकर सजग न होते तो नगर निगम की नाक के नीचे शहर के बीचोबीच यह अतिक्रमण हो जाता।सूत्रों का कहना है कि इस बिल्डर्स का पहले भी विवादों से नाता रहा है ओर इसको नगर निगम प्रशासन ही नहीं जिला व पुलिस प्रशासन भी अच्छे तरीके से जानते व पहचानते हैं। कई प्रार्थना पत्र इसके खिलाफ जिला प्रशासन व पुलिस प्रशासन की टोकरियाें में धूल फांकते देखे जा सकते हैंं।बता दें कि उत्तराखण्ड हाईकोर्ट द्वारा 24 मार्च 2025 को राज्य सरकार को निर्देश दिये गये थे कि रिस्पना व बिन्दाल नदी तथा उससे जुड़े नाले खालों पर अतिक्रमण नहीं किया जायेगा तथा ऐसा करने वालो पर मुकदमा दर्ज कर कार्यवाही की जाये। लेकिन लगता है कि देहरादून नगर निगम प्रशासन उन आदेशों की अवेहलना कर रहा है। क्योंकि जब अतिक्रमण होता है तो शिकायत के बावजूद वहंा कोई कार्यवाही समय पर नहीं की जाती है। यही बात अतिक्रमण के मामलों में नगर निगम की भूमिका को संदिग्ध बनाता है।