राजधानी देहरादून में बीती देर रात हुए भीषण सड़क हादसे में छह छात्र—छात्राओं की मौत हो गई तथा एक को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है। इन सभी छात्र—छात्राओं की उम्र 20 से 25 साल के बीच है तथा सभी दून के ही एक कॉलेज के हैं। रात के 2 बजे के आसपास इनकी इनोवा कार एक कंटेनर से टकराते हुए 200 मीटर आगे जाकर एक पेड़ से टकरा गई। कार की अनियंत्रित गति इस हादसे का कारण बताई जा रही है। यह कोई पहला ऐसा हादसा नहीं है जब किसी युवा या छात्र ने इस तरह से दुर्घटना में अपनी जान गंवाई हो। अभी मई 2024 में मसूरी रोड पर हुए एक ऐसे ही हादसे में पांच युवा लड़के—लड़कियों की जान चली गई थी जब उनकी कार देर रात अनियंत्रित होकर खाई में गिर गई थी। देर रात होने वाले इस तरह के हादसों के पीछे खाली सड़के और उन पर सरपट दौड़ती यह गाड़ियां और बढ़ती नशा वृत्ति अहम कारण है। जहां एक ओर उत्तराखंड के पड़ोसी राज्यों से युवा मौज मस्ती के लिए पहाड़ पर आते हैं वहीं स्थानीय स्कूल और कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र—छात्राओं द्वारा छुटृी के दिन घूमने फिरने के प्रोग्राम बना लिए जाते हैं बदलते परिवेश में युवाओं की जीवन श्ौली में आए बड़े बदलाव से जोड़कर भी इन हादसों को देखा जा सकता है। पृथक राज्य बनने के बाद उत्तराखंड खास तौर से देहरादून और उसके आसपास के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर स्कूल—कॉलेज कोचिंग सेंटर और प्रौघोगिकी के प्रशिक्षण देने वाले संस्थानों की बाढ़ जैसी आ गई है। देशभर से छात्र—छात्राओं का उत्तराखंड जाकर शिक्षा ग्रहण करना एक सपना जैसा बन गया है। उत्तराखंड का श्ौक्षणिक माहौल कैसा है उसे यहां रहने वाले लोग अच्छी तरह जानते समझते हैं लेकिन समय के साथ एक मिनी गोवा का रूप लेते दून में शिक्षा के साथ—साथ ड्रिंक और डांस तथा ड्राइविंग का जो आधुनिक माहौल तैयार हो चुका है उसमें अन्य राज्यों से आने वाले छात्र—छात्राएं दिशा भ्रमित होकर रह जाते हैं। इन युवाओं को न तो यह याद रहता है कि उनके परिजनों ने उन्हें यहां किस उद्देश्य के साथ भेजा है। और न इस बात की उन्हें परवाह होती है कि किसी वैसी अनहोनी जैसी बीती रात में इस हादसे के कारण हुई उनके परिजनों का क्या हाल होगा। सवाल इस बात का नहीं है कि किसने अपना बेटा खोया या बेटी को खो दिया। सवाल इस बात का है कि गलती क्या हुई जिसके कारण इस पहाड़ जैसे दुख का उन्हें सामना करना पड़ता है संतान किसी की भी हो और कैसी भी हो हर एक माता—पिता अपनी संतान और परिवार की सुरक्षा की कामना करता है और जब एक छोटी सी चूक परिवार पर भारी पड़ जाती है तो इसका प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ता है। इस तरह की हादसों को कैसे रोका जा सकता है इस पर सूबे के शासन व प्रशासन को भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।



