हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद भी उपनल कर्मियों को उत्तराखंड सरकार नियमित करने को तैयार नहीं है। उपनल के जरिए नौकरी पाने वाले इन 20000 से भी अधिक कर्मचारी महज 8400 की पगार में कैसे अपना जीवन यापन कर रहे होंगे। इस बात को कोई भी आम आदमी समझ सकता है। लेकिन सरकार इन कर्मचारियों की समस्याओं को समझने के लिए तैयार नहीं है। इस छोटी सी पगार में से भी 18 फीसदी जीएसटी और 2.5 फीसदी सेवा कर काट लिया जाता है। अपने नियमिती करण की मांग को लेकर धरने प्रदर्शन और आंदोलनों से भी जब कोई हल नहीं निकल सका तो यह मामला हाई कोर्ट पहुंच गया। हाई कोर्ट द्वारा सरकार को आदेश दिया गया कि सरकार 6 माह के अंदर कर्मचारियों को महंगाई भत्ते के साथ न्यूनतम वेतन प्रदान करें तथा उनके वेतन में कोई कटौती नहीं की जाए तथा चरणबद्ध तरीके से उन्हें नियमित किया जाए। 2018 से यह मामला न्यायाधीन है। सरकार ने जब हाई कोर्ट की बात नहीं मानी तो मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया जिसमें अभी 2 दिन पूर्व ही सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में कोई दखल न करने की बात कहते हुए राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया गया। लेकिन सरकार अभी भी इस मामले को लेकर फिर सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करने का मन बनाए बैठी है। इसका सीधा मतलब यह है कि सरकार इन उपनल कर्मचारियों को नियमित करने के पक्ष में नहीं है। सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का विधिक परीक्षण करने के बाद फैसला लेने की बात कही जरूर गई थी लेकिन उसकी मंशा कतई भी नहीं है कि इन कर्मचारियों की कोई बात मानी जाए। नियमानुसार इतने लंबे समय से संविदा पर काम करने वाले इन कर्मचारियों को नियमित कर दिया जाना चाहिए क्योंकि उनकी भर्ती किसी चोर दरवाजे से नहीं हुई है। जिस तरह से सचिवालय और विधानसभा में नियुक्तियां की गई थी। एक तरफ सत्ता में बैठे लोगों द्वारा अपने बहू बेटों और सगे संबंधियों को बिना किसी औपचारिकता के नौकरी दे दी जाती है और सीना ठोक कर यह कहा जाता है कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है लेकिन वहीं उपनल के माध्यम से जो लोग नौकरी पर रखे गए हैं उन्हें सरकार नियमित करने को तैयार नहीं है जबकि वह सालों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। सरकार का तर्क है कि वह इससे पड़ने वाले आर्थिक बोझ को वहन नहीं कर सकती है। सवाल यह है कि यह कर्मचारी सरकारी सिस्टम से ही नौकरी पर रखे गए हैं जोर जबरदस्ती से नौकरी में नहीं घुस गए। वही अभी बीते दिनों माननीयों द्वारा अपने वेतन और भत्तोंं में एक लाख रूपये महीना तक इजाफा कर लिया गया और सरकार पर इसका कोई आर्थिक बोझ नहीं बढ़ा। उल्टा संसदीय कार्य मंत्री तर्क देते हैं कि महंगाई भी बढ़ रही है। क्या इन सत्ता में बैठे लोगों को यह नहीं सोचना चाहिए कि उनका गुजारा लाखों में भी नहीं हो रहा है फिर यह उपनल कर्मी 8400 में गुजारा कैसे कर पाते होंगे महंगाई तो उनके लिए भी बढ़ रही है। सरकार को इन कर्मचारियों की समस्याओं पर क्या गंभीरता से विचार नहीं करना चाहिए?


