May 19, 2026देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वरिष्ठ राजनेता मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी (सेवानिवृत्त) के निधन पर गहरा दुःख व्यक्त किया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि खंडूड़ी जी ने भारतीय सेना में रहते हुए राष्ट्र सेवा, अनुशासन एवं समर्पण का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया। सार्वजनिक जीवन में भी उन्होंने उत्तराखंड के विकास, सुशासन, पारदर्शिता और ईमानदार कार्यशैली की मजबूत पहचान बनाई। उन्होंने प्रदेशहित में अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लेकर विकास को नई दिशा प्रदान की। मुख्यमंत्री ने कहा कि खंडूड़ी जी की सादगी, स्पष्टवादिता एवं कार्यकुशलता सदैव प्रेरणास्रोत रहेगी। उनका निधन उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति के लिए भी अपूरणीय क्षति है। मुख्यमंत्री ने ईश्वर से पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान तथा शोक संतप्त परिजनों एवं समर्थकों को यह असीम दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की है।
May 19, 2026देहरादून। जिला प्रशासन ने कानून व्यवस्था एवं आमजन की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए कुख्याल बिल्डर पुनीत अग्रवाल को 6 माह के लिए जिला बदर करने के आदेश पारित किये।आज यहां जिला प्रशासन ने कानून व्यवस्था एवं आमजन की सुरक्षा को सर्वाेच्च प्राथमिकता देते हुए एटीएस कॉलोनी में आतंक और भय का वातावरण पैदा करने वाले बिल्डर पुनीत अग्रवाल के विरुद्ध बड़ी कार्रवाई की है। जिला मजिस्ट्रेट सविन बंसल ने उत्तर प्रदेश/उत्तराखण्ड गुण्डा नियंत्रण अधिनियम—1970 की धारा 3(3) के अंतर्गत पुनीत अग्रवाल को “गुण्डा” घोषित करते हुए 06 माह के लिए जनपद देहरादून की सीमा से बाहर रहने के आदेश जारी किए हैं। प्रकरण की शुरुआत एटीएस कॉलोनी निवासी एवं डीआरडीओ वैज्ञानिक हेम शिखा सहित अन्य निवासियों द्वारा 25 अप्रैल 2026 को जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत शिकायती प्रार्थना पत्र से हुई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि पुनीत अग्रवाल द्वारा 13 अप्रैल 2026 को डीआरडीओ में कार्यरत वैज्ञानिक के परिवार पर आक्रामक एवं जानलेवा हमला किया गया। मारपीट में पीड़ित का कान का पर्दा फट गया तथा महिलाओं एवं बुजुर्गों के साथ अभद्रता और गाली—गलौच की गई। शिकायतकर्ताओं ने आरोपी को महिलाओं, बच्चों एवं वरिष्ठ नागरिकों को डराने—धमकाने वाला असामाजिक तत्व बताते हुए गुण्डा एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग की। मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला मजिस्ट्रेट ने उप जिलाधिकारी मसूरी से गोपनीय जांच कराई गई। जांच में क्षेत्रवासियों ने बताया कि पुनीत अग्रवाल का व्यवहार लगातार भय और असुरक्षा का वातावरण उत्पन्न कर रहा था तथा उसके विरुद्ध पहले से कई आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं। थाना रायपुर में दर्ज एफआईआर, सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो क्लिप्स तथा स्थानीय निवासियों की सामूहिक शिकायतों को न्यायालय ने गंभीरता से लिया। प्रकरण में डीआरडीओ के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं निदेशक मनोज कुमार ढाका द्वारा भी शिकायत प्रस्तुत कर कार्रवाई की मांग की गई थी। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि आरोपी का व्यवहार समाज में भय और असुरक्षा का कारण बन चुका है तथा यदि उस पर रोक नहीं लगाई गई तो कभी भी गंभीर अप्रिय घटना हो सकती है। वहीं विपक्षी पक्ष द्वारा इसे आपसी रंजिश एवं सिविल विवाद बताया गया, लेकिन उपलब्ध साक्ष्यों, दर्ज मुकदमों, वायरल वीडियो, शिकायतों तथा गोपनीय जांच रिपोर्ट के आधार पर जिलाधिकारी न्यायालय ने पाया कि पुनीत अग्रवाल अभ्यस्त आपराधिक प्रवृत्ति का व्यक्ति है, जो लोगों को डराने—धमकाने और क्षेत्र में अशांति फैलाने का आदी है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि पुनीत अग्रवाल अगले 06 माह तक देहरादून जनपद की सीमा में बिना अनुमति प्रवेश नहीं कर सकेगा। यदि वह आदेश का उल्लंघन करता है तो उसके विरुद्ध कठोर कारावास एवं जुर्माने की कार्रवाई की जाएगी। थाना रायपुर पुलिस को आदेश की तत्काल तामील कराते हुए आरोपी को 24 घंटे के भीतर जनपद से बाहर भेजने के निर्देश दिए गए हैं।
May 19, 2026वह देश में हिंदू—मुस्लिम करते रह गए और देश की अर्थव्यवस्था का दम निकल गया। उनका दावा था कि उन्होंने 45 करोड लोगों को गरीबों की रेखा से ऊपर निकाला है और अब कह रहे हैं कि देश की आधी आबादी गरीबी की ऐसी खाई में गिरने वाली है जहां से बाहर निकलने में कई दशक का समय लग जाएगा। उनकी कौन सी बात सही है और कौन सी बात गलत है इसका फैसला भी जनता ही करें जिनके कंधों पर देश की अर्थव्यवस्था को संभालने की जिम्मेदारी डालकर प्रधानमंत्री विदेश घूम रहे हैं। लेकिन यह 100 फीसदी सही है कि देश की अर्थव्यवस्था ऐसी गंभीर स्थिति में पहुंचे चुकी है जहां से बाहर निकलने का रास्ता अब सरकार के पास नहीं है। अगर होता तो शायद प्रधानमंत्री अभी दो—चार महीने इस सच को देश से छुपाए ही रखते। डॉलर के मुकाबले रुपए का लगातार कमजोर होना जो अब एक डालर 95 रूपये के बराबर हो चुका है बहुत ही जल्दी 100 के भी पार जाने वाला है। पूर्व पीएम डा. मनमोहन सिंह के कार्यकाल के 10 साल में डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत में 35 फीसदी की गिरावट आई थी वहीं पीएम मोदी के 11 साल के कार्यकाल में यह गिरावट 57 फीसदी हुई है। मोदी ने जब सत्ता संभाली थी तब एक डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत 61.03 थी जो आज वर्तमान में 95 तक पहुंच चुकी है। डॉलर के मुकाबले रुपया औसतन चार फीसदी गिरने का गणित था लेकिन इस गिरावट को आरबीआई डॉलर बेचकर आसानी से संभाल लेता था लेकिन अब उसने भी हाथ खड़े कर दिए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही अब विदेशी मुद्रा बचाने के लिए जनता से सोना न खरीदने की अपील कर रहे हो तथा तेल व आम जरूरतों में कटौती के साथ उर्वरको के इस्तेमाल को भी आधा करने का सुझाव दे रहे हो लेकिन सरकार ने खुद बीते माह 168 टन सोना खरीदा है। सीधी बात है कि सोना डॉलर देकर ही खरीदा गया होगा अब भारत के पास कुल स्वर्ण भंडार 880 टन है। इसमें कोई शक नहीं है कि सोना ही एक ऐसी धातु है जो आपदा के समय राष्ट्र व किसी व्यक्ति का सबसे बड़ा सहारा होता है लेकिन 880 टन सोना भी भारत की अर्थव्यवस्था को वर्तमान बदहाली से बाहर निकाल पाने में सक्षम नहीं है। यही कारण है कि पीएम मोदी ने अब आम जनता जो पहले ही बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी की मार से परेशान है, के कंधों पर इस संकट की जिम्मेदारी डालकर पल्ला झाड़ लिया है और नीदरलैंड में जाकर यह कह रहे हैं कि अगर हमने शीघ्र ही अंतर्राष्ट्रीय सप्लाई चेन की पुख्ता मरम्मत नहीं की तो आने वाले समय में भारत ही नहीं विश्व के तमाम अन्य देशों की भी बड़ी जनसंख्या गरीबी की खाई में चली जाएगी जिसे संभालने में कई दशक का समय लग जाएगा। पीएम मोदी से देश की जनता को यह जरूर पूछना चाहिए की 12 सालों से देश की सत्ता के शीर्ष पर बैठकर आप क्या कर रहे थे और क्या यह आर्थिक संकट केवल खाड़ी युद्ध के कारण पैदा हुआ है अथवा क्या रातों—रात देश की अर्थव्यवस्था की इतनी खराब हालत हुई है? देश से जिस तेजी से विदेशी निवेशक पलायन कर रहे हैं इस पर कभी आपकी नजर क्यों नहीं गई। अगर किसानों को फर्टिलाइजर नहीं मिलेगा या उसके उपयोग को वह आधा कर देंगे तो देश के खाघान्न उत्पादन में 25 फीसदी गिरावट आना तय है। अभी तो सिर्फ महंगाई बढ़ने की चर्चा हो रही है अगर ऐसा हुआ तो देश में महंगाई बेरोजगारी और गरीबी ही नहीं बढ़ेगी भुखमरी के हालात भी पैदा हो जाएंगे। देश की सत्ता में बैठे लोग इस दशक को आपदाओं का दशक बताकर अपनी जिम्मेवारियों से पल्ला झाड़ने में अभी से जुट गए हैं। ऐसी स्थिति में अब सिर्फ भगवान भरोसे ही जनता है।
May 18, 2026दून की सड़कों पर जुगाड मालवाहक वाहनों की आयी बाढ़ देहरादून। राजधानी देहरादून की सड़कों पर जुगाड मालवाहक वाहनों की बाढ़ आ गयी है। प्रशासन व सम्बन्धित विभाग की शायद कार्यवाही तब होगी वह भी कुछ दिन के लिए,जब यह यमराज किसी की जान ले लेगा।बता दें कि राजधानी देहरादून में बीते कई वर्षो से जाम व सड़क हादसों की बाढ़ सी आयी हुई है। सम्बन्धित विभाग व प्रशासन हर बार दावे करता है कि वह शहर से जाम व सड़क हादसों का यह क्रम जल्द ही दूर कर देगा। लेकिन वह अपने वायदों मेें कामयाब नही हो पा रहा है। ऐसा इसलिये है कि क्योंकि यातायात से सम्बन्धित विभाग अपने काम को सही व सूचारू ढंग से नही कर पा रहे है। जबकि इन विभागों के अधिकारी हर समय दावा करने से पीछे नहीं हटते है कि वह जल्द इन समस्याओं का समाधान कर देगें। सड़क हादसे कैसे हो सकते है इसका ताजा उदाहरण सड़क के बीचोबीच यह तस्वीर देखकर लगाया जा सकता है। जिसमें जुगाड़ वाहन बिना कागजो के सड़क पर लोडर वाहनो की तरह दौड़ रहे है।बता दे कि यह वाहन कई चौराहों से होकर आया होगा लेकिन किसी ने इसको रोका नही। 2 मीटर के तथाकथित वाहन पर 6 मीटर की खतरनाक लोहा यही नही मोबाइल पर भी लगा ,जैसे ही अचानक रोकेगा, पीछे बाला वाहन इसमें समा जायेगा,यह स्थिति तब होगी जब आगे बाला अचानक रोकेगा तो वह इसमें समा जायेगा,इसका कुछ नही बिगड़गा। प्रशासन की समझ में यह कब आयेगा, सोचनीय सवाल है।
May 18, 2026पत्थर के घर उजड़े, तिबारियां टूटीं तो घन्दूणी ने भी छोड़ दिया आंगन पहाड़ के गांवों से घन्दूणी के गायब होने के साथ मिट गई बचपन की यादें देवभूमि के उजड़ते गांवों और रिश्तों की सबसे भावुक दास्तान है घन्दूणी घन्दूणी का मौन दे रहा पलायन का दंश झेल रहे पहाड़ के गांवों की गवाही देहरादून। पहाड़ के पारंपरिक पत्थरों वाले मकानों की खोली, लकड़ी की नक्काशीदार खिड़कियां और आंगन में सूखता मडुआ… इन सबके बीच जो एक आवाज पहाड़ के सुबह की पहचान हुआ करती थी, वह थीकृचीं-चीं, चूँ-चूँ। उत्तराखंड की लोकभाषा में जिसे बड़े लाड से घन्दूणी कहा जाता है, यानी हमारी अपनी गौरैया। पहाड़ के गांवों में कभी सुबह की शुरुआत घन्दूणी यानी गौरैया की चहचहाहट से होती थी। पत्थर की छतों और लकड़ी की तिबारियों वाले घरों में फुदकती यह छोटी चिड़िया गांव की रौनक मानी जाती थी। लेकिन अब बदलते पहाड़, तेजी से बढ़ते पलायन और आधुनिक निर्माण शैली के बीच घन्दूणी की आवाज भी धीरे-धीरे खामोश पड़ने लगी है।पहाड़ के लोकगीतों में गौरैया यानी घन्दूणी को मैत की डाकिया कहा गया है। यह चिड़िया इस बात की गवाह है कि पहाड़ का सौंदर्य सिर्फ बर्फबारी और पहाड़ों की ऊंचाई में नहीं, बल्कि इन आंगनों की जीवंतता में है। आज उत्तराखंड के हजारों गांव आज पलायन की मार झेल रहे हैं। रोजगार, शिक्षा और बेहतर सुविधाओं की तलाश में लोग शहरों की ओर जा रहे हैं, जिन आंगनों में कभी बच्चों की किलकारियां और महिलाओं की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब सन्नाटा पसरा है। इसी बदलते माहौल का असर घन्दूणी यानी गौरैया पर भी दिखाई दे रहा है।मेरे ननिहाल दानकोट गांव के चेतराम बताते हैं कि पहले सुबह होते ही दर्जनों गौरैया आंगन में आती थीं। महिलाएं चावल और झंगोरे के दाने डालती थीं और बच्चे घंटों उन्हें देखते रहते थे। लेकिन अब गांवों में पुराने घर टूट रहे हैं और उनकी जगह सीमेंट के आधुनिक मकान ले रहे हैं। इन मकानों में ना तो लकड़ी के छज्जे बचे हैं और ना ही छोटी दरारें, जहां गौरैया अपने घोंसले बनाया करती थी।बुडोली रूद्रप्रयाग के मोहन सिंह कहते हैं कि पहले घन्दूणी की आवाज से लगता था गांव जिंदा है। अब कई दिनों तक उसकी चहचहाहट सुनाई नहीं देती। उनके अनुसार गांवों से पहले लोग गए और अब धीरे-धीरे पक्षी भी गायब होने लगे हैं।विशेषज्ञ मानते हैं कि गौरैया मानव बस्तियों के साथ रहने वाली चिड़िया है। पुराने पहाड़ी घर, गौशालाएं, खुले आंगन और स्थानीय खेती उसके लिए अनुकूल वातावरण तैयार करते थे। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में जैसे-जैसे गांवों की पारंपरिक संरचना खत्म हो रही है, वैसे-वैसे गौरैया का प्राकृतिक संसार भी सिमटता जा रहा है।पर्यावरणविदों का कहना है कि गौरैया का कम होना केवल एक पक्षी का गायब होना नहीं, बल्कि पहाड़ की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना में आए बदलाव का संकेत है। पहाड़ के गांवों से जब इंसानों की रौनक खत्म हुई, तो घन्दूणी की चहचहाहट भी धीरे-धीरे यादों में बदलने लगी है। यदि गांवों में पारंपरिक आंगन, पेड़-पौधे और स्थानीय वातावरण को बचाने की दिशा में प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाले समय में गौरैया सिर्फ किताबों और यादों तक सीमित होकर रह जाएगी।उत्तराखंड के कई गांवों में घर बंद पड़े हैं और आंगन सूने हो चुके हैं। ऐसे में घन्दूणी का गांवों से दूर होना लोगों को भावनात्मक रूप से भी प्रभावित कर रहा है। आज भी कई बुजुर्ग हर सुबह आंगन में कुछ दाने डाल देते हैं। शायद इस उम्मीद में कि कभी फिर घन्दूणी लौटेगी और उसके साथ लौट आएगा पहाड़ का पुराना जीवन, पुरानी गर्माहट और वह खोई हुई रौनक। कंक्रीट के जंगल से उजड़ा आशियानाउत्तराखंड के देहरादून, हल्द्वानी, हरिद्वार में तो कंक्रीट के मकानों और मोबाइल टावरों के रेडिएशन ने गौरैया को पहले ही गायब कर दिया था, लेकिन अब पहाड़ के ग्रामीण इलाकों में भी घन्दूणी का वजूद खतरे में है। कहते है कि जब किसी गांव से पलायन होता है और घरों पर ताले लटक जाते हैं, तो वहां खेती बंद हो जाती है। घन्दूणी को इंसानों के बीच रहने और उनके आंगनों से दाना चुगने की आदत होती है। इंसानों के जाते ही यह चिड़ियां भी भूखी मर जाती हैं या वहां से पलायन कर जाती हैं। पहाड़ के पुराने तिबारी वाले मकानों की छतों और कड़ियों के बीच गौरैया आसानी से घोंसला बना लेती थी। अब वहां भी सीमेंट के पक्के लेंटर वाले मकान बन रहे हैं, जिनमें इस नन्हीं चिड़िया के लिए कोई कोना नहीं बचा हुआ है।
May 18, 2026देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एचडीएफसी बैंक द्वारा प्रदत्त चार अत्याधुनिक एम्बलेंस का फ्लैग ऑफ किया।आज यहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मुख्यमंत्री कैंप कार्यालय से एचडीएफसी बैंक की कॉर्पाेरेट सामाजिक उत्तरदायित्व पहल के अंतर्गत जनहित के लिए प्रदान की गई 4 अत्याधुनिक एम्बुलेंस का फ्लैग ऑफ किया। यह पहल राज्य के दूरस्थ एवं पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। निजी संस्थाओं द्वारा जनहित में किया जा रहा सहयोग सामाजिक उत्तरदायित्व का उत्कृष्ट उदाहरण है। मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड के पर्वतीय एवं दूरस्थ क्षेत्रों में समय पर स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता अत्यंत आवश्यक है। एचडीएफसी बैंक द्वारा सीएसआर के माध्यम से उपलब्ध कराई गईं ये एम्बुलेंस जरूरतमंद लोगों तक त्वरित चिकित्सा सहायता पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। राज्य सरकार जनभागीदारी एवं संस्थागत सहयोग के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।मुख्यमंत्री ने एचडीएफसी बैंक की इस जनकल्याणकारी पहल की सराहना करते हुए कहा कि बड़े धार्मिक आयोजनों, आपदा की स्थितियों तथा दूरस्थ क्षेत्रों में ऐसी सेवाएं अत्यंत उपयोगी सिद्ध होंगी। मुख्यमंत्री ने राज्य के अन्य पर्वतीय जनपदों और आगामी हरिद्वार कुंभ के लिए भी एचडीएफसी बैंक से सीएसआर के माध्यम से और एम्बुलेंस उपलब्ध कराने की अपेक्षा की है। बैंक अधिकारियों ने अवगत कराया कि इन एम्बुलेंस में आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं एवं आवश्यक आपातकालीन उपकरण उपलब्ध हैं, जिससे जरूरतमंद मरीजों को समय पर उपचार उपलब्ध कराया जा सकेगा। साथ ही आगामी तीन वर्षों तक प्रत्येक एम्बुलेंस में चिकित्सक, नर्स, अटेंडेंट एवं चालक की व्यवस्था भी बैंक द्वारा सुनिश्चित की जाएगी।प्रारंभिक चरण में ये एम्बुलेंस चमोली, चंपावत, पिथौरागढ़ एवं रुद्रप्रयाग जनपदों में स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करेंगी तथा भविष्य में राज्य के प्रमुख धार्मिक आयोजनों एवं आपदा प्रबंधन कार्यों में भी इनका उपयोग किया जाएगा। इस अवसर पर विधायक राजकुमार पोरी, विनोद कंडारी,अपर सचिव मनमोहन मैनाली, एचडीएफसी बैंक के से मुस्कान सिंह (ब्रांच बैंकिंग हेड— नॉर्थ 3), संजीव कौशिक (रीजनल हेड— नॉर्थ 3), जोनल हेड उत्तराखंड बकुल सिक्का, स्टेट हेड उत्तराखंड गौरव जैन एवं आयुष सिंघल मौजूद थे।