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बेरोजगार युवा, बड़ी समस्या

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उत्तराखंड राज्य गठन के बाद सरकारी नौकरियों की जिस तरह से लूटपाट होती रही है उसका सच किसी से भी छिपा नहीं है। इस खेल में सबसे ज्यादा नुकसान उन पढ़े लिखे और योग्य युवाओं को हुआ है जो आज भी बेरोजगार है और अब उनकी आयु सीमा भी नौकरी पाने की तय आयु सीमा के पार जा चुकी है या पार जाने वाली है। सरकार द्वारा अगर राज्य बनने के बाद से इस मुद्दे पर उचित तरीके से ध्यान दिया गया होता तो निश्चित तौर पर न तो यह बेरोजगारी की स्थिति विस्फोटक रूप लेती और न सरकार को सामूहिक नियुक्ति पत्र वितरण के कार्यक्रम आयोजित कर यह संदेश देने या प्रचार करने की जरूरत पड़ती कि वह युवाओं के रोजगार के मुद्दे पर गंभीरता से काम कर रही है। इन दिनों युवाओं द्वारा रोजगार के मुद्दे पर अनिश्चितकालीन धरना—प्रदर्शन किया जा रहा है। इन युवाओं की मांग है कि पुलिस कांस्टेबल की भर्तियों के लिए आयु सीमा में बढ़ोतरी की जाए 8 सालों से राज्य में पुलिस कांस्टेबल की भर्ती नहीं की गई है। जो युवा इस सेवा के लिए तैयारी कर रहे थे स्वाभाविक तौर पर अब उनकी आयु अधिक हो चुकी है। उधर राज्य में संविदा कर्मियों के नियमितिकरण का जो मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है अगर सरकार अपने स्तर पर उसे सुलझा पाई होती तो इन संविदा कर्मियों को अदालत का दरवाजा खटखटाने की जरूरत नहीं पड़ी होती। राज्य के विभिन्न विभागों में 15000 से अधिक संविदाकर्मियों को अपने नियमित किए जाने का इंतजार है। सरकार द्वारा 2011 की नियमावली में उन कर्मचारियों को नियमित करने का फैसला किया गया था जिनकी सेवा के 10 साल पूरे हो चुके हैं। लेकिन 2016 में इसे 5 साल कर दिया गया। राज्य गठन के बाद सरकार ने जिन विभागों में कर्मचारियों की जरूरत थी उनमें ही नहीं जिनमें जरूरत नहीं थी उन विभागों में भी अंधाधुंध संविदा और दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को नौकरियां दे दी गई। इन संविदा व दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों की नियुक्तियों के लिए तमाम नियम और कानूनों को भी दरकिनार कर दिया गया। सिर्फ शासन—प्रशासन में बैठे लोगों के साथ रसूकदार ही संविदा पर नौकरी पाने के लिए काफी होते थे। विधानसभा और सचिवालय में संविदा पर नौकरी पाने को लेकर विगत समय में जो विवाद हुआ था उस समय इस बात की पुष्टि हुई थी कि महज एक सादा कागज में चार लाइन का प्रार्थना पत्र लिखने वाले भी नौकरी पा गए उनकी तो बात ही क्या करना जिन्होंने स्पीकर या मंत्री जैसे पदों पर बैठकर अपने सगे संबंधियों या रिश्तेदारों को नौकरियों पर लगा दिया। खैर संविदा की बात हो या फिर दैनिक वेतन भोगी किसी कर्मचारी की या तो उनके लिए ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए थी कि एक निर्धारित समय सीमा पर उनकी नौकरी समाप्त कर दी जाती या फिर उनके नियमित होने की पुख्ता गारंटी होती अब वह लोग जो 10—15 या 5 साल से संविदा पर नौकरी कर रहे हैं उन्हें आप कैसे धक्का देकर बाहर निकाल सकते हैं। उनके भी तो कुछ कानूनी अधिकार है लेकिन सरकार इनके नियमितीकरण का व्यय भार झेलने या उठाने को तैयार नहीं है। भले ही वह विधायकों के वेतन भत्तों में लाखों की बढ़ोतरी कर रही हो। पेपर लीक या भर्तियों में धांधली का मुद्दा अलग बात है। युवा बेरोजगार किस—किस स्तर पर अन्याय की मार झेल रहे हैं यह तो वह खुद ही जानते हैं। सरकार और न्यायपालिका उनके लिए क्या करती है यह आने वाला समय ही बताएगा।

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